- ग्रामीणों ने लगाया बिना नोटिस कार्रवाई का आरोप
- परियोजना क्षेत्र में संरचनाओं को हटाने की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रावधानों के आधार पर की गई
Hazaribagh News : केरेडारी प्रखंड अंतर्गत जोरदाग गांव के विस्थापित क्षेत्र में बने कई मकानों और संरचनाओं को हटाए जाने को लेकर विवाद सामने आया है. ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि नकुल साव, भीम साव, खिरोधर साव, केदार साव समेत अन्य लोगों के घरों को बिना पूर्व सूचना या नोटिस के ध्वस्त कर दिया गया. ग्रामीणों का दावा है कि इन मकानों के निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च हुए थे.
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि एनटीपीसी व ऋत्विक कंपनी से जुड़े लोगों और कुछ स्थानीय लोगों की मौजूदगी में कार्रवाई की गई. उनका कहना है कि यदि मकानों को हटाने की कोई वैधानिक प्रक्रिया थी, तो संबंधित परिवारों को पहले नियमानुसार नोटिस दिया जाना चाहिए था. ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और मकानों को ध्वस्त किए जाने की कार्रवाई की जिम्मेदारी तय करने की मांग की है.
हालांकि चट्टी बरियातू कोयला खनन परियोजना ने ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों पर सफाई दी है और मकान ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को पूरी तरह नियमसम्मत बताया है. परियोजना प्रबंधन के अनुसार, 30 सितंबर को भूमि अधिग्रहण के तहत परियोजना क्षेत्र में संरचनाओं को हटाने की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रावधानों और सक्षम प्राधिकारियों के निर्देश के अनुरूप की गई.
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प्रबंधन का कहना है कि कार्रवाई के दौरान किसी भी विधिसम्मत आवासीय संरचना को नहीं हटाया गया और संबंधित प्रभावित व्यक्तियों को नियमानुसार आवश्यक नोटिस जारी किए गए थे. कहा कि खनन क्षेत्र में बिना वैधानिक अनुमति नई संरचनाओं का निर्माण नियमों के अनुरूप नहीं है.
परियोजना प्रबंधन ने यह भी कहा कि भूमि अधिग्रहण, मुआवजा और संरचनाओं को हटाने से संबंधित सभी कार्रवाई दस्तावेजी साक्ष्यों एवं लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर की जा रही है. प्रबंधन की ओर से यह भी दावा किया गया कि कार्रवाई के दौरान अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ कथित अभद्र व्यवहार, विरोध तथा जान से मारने की धमकी की शिकायतें सामने आई हैं.
इसके अलावा परियोजना क्षेत्र में दोबारा अनधिकृत संरचनाएं खड़ी करने और मुआवजा प्राप्त करने के प्रयास से संबंधित शिकायतें मिलने की बात भी कही गई है. परियोजना प्रबंधन के अनुसार, इन मामलों की जांच संबंधित अभिलेखों और तथ्यों के आधार पर की जा रही है.
मामले में ग्रामीणों के आरोप और परियोजना प्रबंधन के दावे अलग-अलग हैं. ऐसे में पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मकानों को हटाने की कार्रवाई किन परिस्थितियों में और किस प्रक्रिया के तहत की गई.

