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HC ने अधिकारियों की मिलीभगत से वन भूमि की अवैध रूप से खरीद-बिक्री से संबंधित PIL की निष्पादित

झारखंड की राजधानी रांची की खबरें
  • PIL में कोई अतिरिक्त निर्देश जारी करने से कोर्ट का इनकार
  • कोर्ट ने कहा, केवल आरोपों के आधार पर CBI या ED जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता
  • राज्य के अधिकारी पहले से जांच और कार्रवाई कर रहे हैं, इसलिए CBI/ED जांच का कोई आधार नहीं बनता
  • याचिकाकर्ता की मंशा और साख पर हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने शिव शंकर शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) का निष्पादित करते हुए कोई अतिरिक्त निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक एवं जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है और उसने बिना पर्याप्त साक्ष्यों के गंभीर आरोप लगाए हैं. 

 

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि झारखंड में लगभग 450–1000 एकड़ वन भूमि अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध रूप से बेची गई है और CBI एवं ED जांच की मांग की थी. खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि केवल आरोपों के आधार पर CBI या ED जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता. ऐसा आदेश केवल असाधारण परिस्थितियों में दिया जाता है.

 

इस मामले में राज्य के अधिकारी पहले से जांच और कार्रवाई कर रहे हैं, इसलिए CBI/ED जांच का कोई आधार नहीं बनता. खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के अधिकांश आरोप अतिरंजित, असमर्थित और विलंब से लगाए गए हैं. फिर भी पर्यावरण संरक्षण के महत्व को देखते हुए न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर विचार किया.

 

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि जिन व्यक्तियों के विरुद्ध अलग से कार्यवाही लंबित है उन्हें "क्लीन चिट" दे दी गई है, उनके मामले कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से तय होंगे. खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की साख और नीयत गंभीर रूप से संदेहास्पद है. उसके विरुद्ध पहले भी कई निराधार PIL दायर करने और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग संबंधी टिप्पणियां हो चुकी हैं.

 

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि PIL केवल स्वच्छ नीयत और विश्वसनीय सामग्री के आधार पर ही स्वीकार की जा सकती है. जनहित याचिका में दावा किया गया था कि हजारीबाग, बोकारो और अन्य जिलों में लगभग 450 एकड़ से अधिक वन भूमि की अवैध बिक्री हुई है. आरोप लगाया गया था कि वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत से निजी व्यक्तियों और कंपनियों को वन भूमि हस्तांतरित की गई. साथ ही सीबीआई और ईडी से जांच कराने और संबंधित अधिकारियों की संपत्तियों की जांच की मांग भी की गई थी.

 

राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत 2,003 बिक्री विलेखों की जांच की गई. इनमें केवल 74 बिक्री विलेख ही अधिसूचित वन क्षेत्र से आंशिक या पूर्ण रूप से जुड़े पाए गए. इनका कुल क्षेत्रफल 112.3098 एकड़ था, जिसमें से लगभग 91.53 एकड़ वन सीमा के भीतर पाया गया. इनमें भी 80.03 एकड़ भूमि वन विभाग के शांतिपूर्ण कब्जे में है, जबकि करीब 11.49 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण मिला. इन मामलों में वन अपराध दर्ज कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की जा चुकी है. खंडपीठ ने पाया कि वन विभाग द्वारा किसी भी बिक्री विलेख के लिए No Objection Certificate (NOC) जारी नहीं किया गया था.

 

इसलिए अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप रिकॉर्ड से सिद्ध नहीं हुआ. इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स संबंधी आरोप पर खंडपीठ ने कहा कि कंपनी के विरुद्ध आरोप वर्ष 2009 के हैं जबकि याचिका 2020 में दायर की गई. कंपनी को पक्षकार भी नहीं बनाया गया. रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि संबंधित विभाग 2009 से ही कार्रवाई कर रहे थे, इसलिए नई CBI/ED जांच की आवश्यकता नहीं है.

 

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