Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा कि यदि किसी विधि स्नातक ने बार काउंसिल में नामांकन के लिए आवेदन देते समय सभी पात्रताएं पूरी कर ली थीं, तो बाद में अस्थायी नियुक्ति मिलने के आधार पर उसका एनरोलमेंट रोका नहीं जा सकता. यह आदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आनंदा सेन ने पारित किया.
दरअसल, यह मामला रांची निवासी रिचा प्रिया द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था. याचिकाकर्ता ने वर्ष 2024 में एमिटी यूनिवर्सिटी, झारखंड से बी.ए. एलएल.बी. (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त करने के बाद 30 अगस्त 2024 को झारखंड स्टेट बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन के लिए आवेदन दिया था. आवेदन की जांच 11 सितंबर 2024 को पूरी हो गई थी और निर्धारित 14 दिनों की अवधि भी 26 सितंबर 2024 को समाप्त हो चुकी थी.
इसी बीच, झारखंड हाईकोर्ट ने लॉ रिसर्चर/रिसर्च एसोसिएट के पद पर संविदा नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया, जिसमें रिचा प्रिया का चयन हुआ और उन्हें 27 सितंबर 2024 को नियुक्ति पत्र जारी किया गया. उन्होंने 3 अक्टूबर 2024 से कार्यभार ग्रहण किया.
स्टेट बार काउंसिल ने अन्य सभी आवेदकों को 15 अक्टूबर 2024 को एनरोलमेंट सर्टिफिकेट जारी कर दिया, लेकिन रिचा प्रिया को यह कहते हुए प्रमाणपत्र नहीं दिया गया कि वह हाईकोर्ट में कार्यरत हैं. याचिकाकर्ता का कहना था कि इस कारण उन्हें मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी और उनके मूल प्रमाणपत्र भी लंबे समय तक रोके गए.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जब याचिकाकर्ता ने आवेदन दिया और जब उनकी जांच पूरी हुई, उस समय वह हाईकोर्ट में कार्यरत नहीं थीं. अदालत ने कहा कि 26 सितंबर 2024 को ही उन्हें नामांकन प्रमाणपत्र जारी कर दिया जाना चाहिए था.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि झारखंड स्टेट बार काउंसिल तत्काल रिचा प्रिया को एनरोलमेंट सर्टिफिकेट जारी करे, जिसकी प्रभावी तिथि 15 अक्टूबर 2024 मानी जाएगी. हालांकि, 3 अक्टूबर 2024 से लेकर हाईकोर्ट में उनकी संविदा नियुक्ति की अवधि तक उनका लाइसेंस निलंबित रहेगा.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए बार काउंसिल प्रत्येक माह कम-से-कम दो बार स्क्रूटनी और एनरोलमेंट कमेटी की बैठक आयोजित करे. कोर्ट ने याचिका को इन्हीं निर्देशों के साथ याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार कर लिया.
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