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HC का फैसला- 4 साल की बेटी की अंतरिम कस्टडी मां को, पिता को वीकेंड पर मिलने का अधिकार

Ranchi News : हाईकोर्ट ने कहा कि गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 के तहत फैमिली कोर्ट को अंतरिम कस्टडी के संबंध में आदेश देने का अधिकार है. फैमिली कोर्ट को मां की अंतरिम कस्टडी की विशिष्ट मांग पर निर्णय करना चाहिए था, लेकिन उसने इस मुद्दे पर फैसला करने के बजाय केवल विजिटेशन राइट्स दे दिये.
 
फाइल फोटो

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने करीब साढ़े चार साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का आदेश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की कस्टडी के मामले में माता-पिता के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित है. कोर्ट ने पिता को बच्ची से सप्ताहांत में मिलने का अधिकार भी दिया है. 

 

 

हाईकोर्ट ने रश्मि कुमारी (बदला हुआ नाम) के मामले में फैसला सुनाया. कोर्ट ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के 27 नवंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मां की ओर से दायर अंतरिम कस्टडी की मांग को खारिज करते हुए केवल मुलाकात का अधिकार दिया गया था.

 

मामले के अनुसार, रश्मि कुमारी (बदला हुआ नाम) और राजन कुमार (बदला हुआ नाम) दोनों एक विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. दोनों की शादी 16 मई 2017 को हुई थी. यह दोनों की दूसरी शादी थी. आईवीएफ प्रक्रिया के जरिए 8 मार्च 2022 को उनकी बेटी एकांशी शर्मा का जन्म हुआ.

 

मां का आरोप था कि वैवाहिक विवाद के बाद पिता ने करीब दो साल तीन महीने की उम्र में बच्ची को अपने पास रख लिया और उसे मां से मिलने नहीं दिया. मां ने बच्ची की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दूसरी ओर, पिता ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि बच्ची जनवरी 2023 से उसके और उसके माता-पिता के साथ रह रही है और हजारीबाग के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रही है.

 

हाईकोर्ट ने कहा कि गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 के तहत फैमिली कोर्ट को अंतरिम कस्टडी के संबंध में आदेश देने का अधिकार है. फैमिली कोर्ट को मां की अंतरिम कस्टडी की विशिष्ट मांग पर निर्णय करना चाहिए था, लेकिन उसने इस मुद्दे पर फैसला करने के बजाय केवल विजिटेशन राइट्स दे दिये.

 

हाईकोर्ट ने कहा कि बच्ची जब अंतरिम आदेश पारित होने के समय करीब तीन साल नौ महीने की थी, तब हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(ए) के तहत पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास रहने का प्रावधान है. हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है और हर मामले में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि रहेगा.

 

कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी के मुद्दे पर कानून और पक्षकारों की दलीलों के अनुरूप विचार नहीं किया. इस कारण उसका आदेश perverse (विकृत/कानून के विपरीत) है और कायम नहीं रखा जा सकता.

 

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