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HC ने राज्य विधि अधिकारियों की नियुक्ति में नियम 3(7) किया रद्द, बाकी चुनौतियां खारिज

Ranchi News: मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने मंगलवार को यह फैसला सुनाया. अदालत ने नियम 3(7) को "अत्यंत अस्पष्ट, प्रकट रूप से मनमाना" और वैधानिक निकायों की स्वायत्तता में अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना.
 

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा विधि अधिकारियों (Law Officers) की नियुक्ति के लिए बनाए गए नियमों और संबंधित अधिसूचनाओं के खिलाफ दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए नियम 3(7) को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया है. बाकी सभी चुनौतियों को अदालत ने खारिज कर दिया.


मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने मंगलवार को यह फैसला सुनाया. अदालत ने नियम 3(7) को "अत्यंत अस्पष्ट, प्रकट रूप से मनमाना" और वैधानिक निकायों की स्वायत्तता में अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना.


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याचिकाकर्ताओं की आपत्ति खारिज

राज्य सरकार ने याचिकाकर्ताओं की पात्रता (locus standi) पर सवाल उठाया था, जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया. कोर्ट ने कहा कि एक प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता और अधिवक्ताओं का संघ, पदों के लिए आवेदन किए बिना भी, कानून के शासन को सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर सकते हैं.

 

अदालत ने नियमों में अनुच्छेद 162 की जगह अनुच्छेद 309 के परंतुक का उल्लेख होने की आपत्ति को भी अस्वीकार कर दिया. साथ ही नियम 6 (पात्रता शर्तें) और नियम 9 (पेशेवर प्रतिबंध) को वैध ठहराया.

पदों की संख्या पर सरकार का फैसला बरकरार

24 जुलाई 2026 की अधिसूचना के जरिए विधि अधिकारियों की संख्या तय करने के फैसले को भी हाईकोर्ट ने सही माना. सरकार के जवाबी हलफनामे के अनुसार विधि अधिकारियों की कुल संख्या अब 81 है, जिनमें 66 बहस करने वाले अधिवक्ता और 15 विधि शोध अधिकारी (Law Research Officers) हैं. पहले बहस करने वाले अधिवक्ताओं के स्वीकृत पद सिर्फ 29 थे.

 

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और कितने विधि अधिकारी नियुक्त हों, यह तय करना सरकार का काम है, जब तक कि मनमानी या अनुचित व्यवहार साबित न हो. सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि जरूरत पड़ने पर पदों की संख्या की समीक्षा कर बढ़ाई भी जा सकती है.


मासिक पारिश्रमिक पर पुनर्विचार का निर्देश

फीस ढांचे से जुड़ी अधिसूचना को भी रद्द नहीं किया गया, लेकिन अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह विधि शोध अधिकारियों को दिए जाने वाले मासिक रिटेनर शुल्क पर पुनर्विचार करे और तीन महीने के भीतर निर्णय ले. आवेदन आमंत्रित करने की सूचना प्रधान सचिव-सह-विधि परामर्शी द्वारा जारी किए जाने को अनुच्छेद 165 का उल्लंघन बताने वाली दलील भी अदालत ने ठुकरा दी. खंडपीठ ने सभी याचिकाओं का निपटारा बिना किसी खर्च (costs) के किया गया. अदालत ने नियम को आंशिक रूप से पूर्ण (made absolute in part) घोषित किया . साथ ही लंबित अंतरिम आवेदनों का निपटारा करते हुए अंतरिम आदेश समाप्त कर दिए.

 

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