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हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत की शर्त को बताया अत्यधिक कठोर, 2 हफ्ते में सरेंडर करे आरोपी

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत की शर्तों को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानत देते समय ऐसी अत्यधिक कठोर शर्त नहीं लगाई जा सकती, जिसका पालन आरोपी के लिए मुश्किल या असंभव हो. कोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्त लगाने का कोई औचित्य नहीं है, जिससे एक हाथ से जमानत देकर दूसरे हाथ से उसे वापस ले लिया जाए.
 
फाइल फोटो

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत की शर्तों को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानत देते समय ऐसी अत्यधिक कठोर शर्त नहीं लगाई जा सकती, जिसका पालन आरोपी के लिए मुश्किल या असंभव हो. कोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्त लगाने का कोई औचित्य नहीं है, जिससे एक हाथ से जमानत देकर दूसरे हाथ से उसे वापस ले लिया जाए.

 

हाईकोर्ट के के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने एक Cr.M.P. की सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्त जो स्वभाव से अत्यधिक कठोर हो अथवा आरोपी के लिए उसका पालन करना संभव न हो, वह व्यवहार में जमानत को निष्प्रभावी कर देती है.


दो सप्ताह में सरेंडर करने की अनुमति

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आज से दो सप्ताह का अतिरिक्त समय निचली अदालत में सरेंडर करने के लिए दिया. अदालत ने 26 मार्च 2014 के आदेश में इसी सीमा तक संशोधन किया और बाकी सभी शर्तों को यथावत रखा. कोर्ट ने याचिका निष्पादित कर दी.

 

याचिकाकर्ता सपथ कुमार चंद्र उर्फ सपथ कुमार चांद, निवासी पथरगामा, गोड्डा ने वर्ष 2014 में मिली अग्रिम जमानत के आदेश में संशोधन की मांग की थी. वर्ष 2014 में अदालत ने जमानत देते हुए उन्हें तीन व्यक्तियों संजय कुमार दुबे, राजेश साह और अरुण सिंह को 35-35 हजार रुपये और जीवन भगत के नाम 23 हजार रुपये का बैंक ड्राफ्ट देने की शर्त लगाई थी.


राशि की व्यवस्था नहीं होने से नहीं कर सके सरेंडर

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उस समय वह निर्धारित राशि की व्यवस्था नहीं कर सके थे. इसी कारण वह तय समय के भीतर निचली अदालत में सरेंडर नहीं कर पाए. अब उन्होंने राशि की व्यवस्था कर ली है और एक सप्ताह के भीतर इसे जमा करने के लिए तैयार हैं. उन्होंने सरेंडर करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा.

 

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता ने विरोध करते हुए कहा कि वर्ष 2014 में अग्रिम जमानत मिलने के बावजूद याचिकाकर्ता ने सरेंडर नहीं किया और करीब 12 वर्ष बाद संशोधन याचिका दाखिल की है.

 

जमानत की शर्त मनमानी नहीं हो सकती

हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्टैच्यूटरी बेल का मामला है और पूर्व में लगाई गई शर्त अत्यधिक कठोर थी, जिससे जमानत देने का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो रहा था. अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय शर्तें लगाना न्यायिक विवेक का हिस्सा है, लेकिन शर्तें न्यायसंगत सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए और मनमानी या यांत्रिक तरीके से नहीं लगाई जा सकतीं.

 

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