- निचली अदालत के आजीवन कारावास की सजा को किया रद्द
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 29 साल पुराने हत्या मामले में तीन अभियुक्तों को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि केवल एक गवाह के बयान के आधार पर अपराध को संदेह से परे सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसलिए निचली अदालत का फैसला टिक नहीं सकता. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने की.
फरवरी 1998 का सजा आदेश रद्द
खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन मुख्य रूप से एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी अभियोजन गवाह संख्या एक की गवाही पर निर्भर है. उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपियों के खिलाफ अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाया.
खंडपीठ ने सेकेंड एडिशनल जुडिशियल कमिश्नर, खूंटी के 4 फरवरी 1998 का दोषसिद्धि का निर्णय और 5 फरवरी 1998 का सजा आदेश रद्द कर दिया. तीनों अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया.
चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें बेल बांड की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया. खंडपीठ ने अपीलकर्ता गणपति महतो एवं वासुदेव सिंह मुंडा की क्रिमिनल अपील को स्वीकार करते हुए मामला समाप्त कर दिया.
क्या था मामला
यह मामला सत्र वाद संख्या 690/1996 से जुड़ा था. निचली अदालत ने 4 फरवरी 1998 को बसुदेव सिंह मुंडा, परशुराम महतो और गणपति महतो को धारा 302/34 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.
अभियोजन के अनुसार, 23 जनवरी 1996 को सोनाहातु थाना क्षेत्र के जामुदाग तुंगरी गांव के पास बिशंभर सिंह मुंडा की तलवार, फरसा और टांगी से हत्या कर दी गई थी. घटना के पीछे जमीन विवाद और हाईकोर्ट में लंबित टाइटल अपील को कारण बताया गया था.
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