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हाईकोर्ट से डाक विभाग की याचिका खारिज, लंबे समय तक निलंबन को ठहराया अनुचित

Ranchi News : हाईकोर्ट ने कहा कि कैट के आदेश में न तो कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि है और न ही ऐसा कोई विकृत निष्कर्ष है, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जाए. कोर्ट ने कैट के 18 जुलाई 2025 के आदेश को बरकरार रखते हुए डाक विभाग की ओर से दायर रिट याचिका खारिज कर दी.
 
झारखंड हाईकोर्ट

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने डाक विभाग के एक कर्मचारी को लंबे समय तक निलंबित रखने के मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), पटना बेंच की सर्किट बेंच रांची के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि बिना आरोप-पत्र दिए तीन महीने से अधिक समय तक निलंबन जारी रखना कानून के अनुरूप नहीं है.

 

हाईकोर्ट ने कहा कि कैट के आदेश में न तो कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि है और न ही ऐसा कोई विकृत निष्कर्ष है, जिसके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप किया जाए. कोर्ट ने कैट के 18 जुलाई 2025 के आदेश को बरकरार रखते हुए डाक विभाग की ओर से दायर रिट याचिका खारिज कर दी.

 

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मामला गिरिडीह डाक मंडल में कोषाध्यक्ष के पद पर कार्यरत रहे शशि भूषण कुमार के निलंबन से जुड़ा था. विभाग के अनुसार, गिरिडीह हेड पोस्ट ऑफिस और गिरिडीह टाउन एसओ में 26 करोड़ रुपये से अधिक के कथित वित्तीय घोटाले में उनकी भूमिका सामने आई थी. उन्हें 27 सितंबर 2019 को निलंबित किया गया था.

 

हालांकि विभागीय कार्यवाही के लिए आरोप-पत्र 7 मार्च 2022 को यानी निलंबन के करीब ढाई साल बाद जारी किया गया. इस दौरान निलंबन की समीक्षा कई बार की गई और अंततः 18 नवंबर 2022 को निलंबन रद्द कर दिया गया.

 

कैट ने तीन महीने बाद का निलंबन किया था रद्द

शशि भूषण कुमार ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में निलंबन को चुनौती दी थी. कैट ने 18 जुलाई 2025 को आदेश पारित करते हुए मूल निलंबन की तारीख 27 सितंबर 2019 से तीन महीने के बाद जारी निलंबन-विस्तार आदेशों को रद्द कर दिया था. 

 

साथ ही कर्मचारी को तीन महीने बाद की अवधि के लिए वेतन पाने का हकदार माना था, जिसमें पहले से प्राप्त निर्वाह भत्ता घटाया जाना था. डाक विभाग ने कैट के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. विभाग की ओर से दलील दी गई कि मामला गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी से संबंधित था और सीबीआई जांच लंबित होने के कारण आरोप-पत्र जारी करने में देरी हुई.

 

सीबीआई जांच लंबित होना पर्याप्त आधार नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामले की जांच लंबित होने के आधार पर किसी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता. इस मामले में आरोप-पत्र जारी करने में करीब ढाई साल लग गए और विभागीय कार्यवाही भी लंबे समय तक चलती रही.

 

विभागीय कार्यवाही में सात साल की देरी पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने विभागीय कार्यवाही को भी अत्यधिक लंबा खींचे जाने पर टिप्पणी की. कोर्ट के अनुसार आरोप-पत्र 7 मार्च 2022 को जारी हुआ, जबकि विभागीय कार्यवाही 2026 में समाप्त हुई. कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी अवधि तक कार्यवाही लंबित रखने का कोई संतोषजनक कारण सामने नहीं आया.

 

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