Ranchi : झारखंड उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार और स्वास्थ्य विभाग को कई निर्देश दिए हैं. हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा है कि राज्य में सभी क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट का स्टेट रजिस्टर तैयार और अपडेट किया जाए.
बिना रजिस्ट्रेशन कोई भी अस्पताल या क्लीनिक संचालित न हो. अस्पतालों का समय-समय पर निरीक्षण किया जाए. मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं और मांगने पर 72 घंटे में उपलब्ध कराए जाएं. अस्पतालों की जांच के लिए फ्लाइंग स्क्वाड बनाने पर विचार किया जाए. खंडपीठ ने स्वास्थ्य सेवा निदेशक को आदेश दिया कि इन निर्देशों के पालन की चार महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाए.
याचिकाकर्ता को नहीं मिली राहत
हालांकि खंडपीठ ने याचिकाकर्ता राजीव रंजन के पिता की मौत से जुड़े मेडिकल लापरवाही के आरोपों पर राहत देने से इनकार कर दिया. दरअसल, याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसके पिता को 2017 में गिरने के बाद इलाज के लिए पहले Rajendra Institute of Medical Sciences (रिम्स), रांची और बाद में Medanta Hospital Ranchi में भर्ती कराया गया था. 15 अक्टूबर 2017 को मेदांता में उनकी मृत्यु हो गई. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि अस्पताल और डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मौत हुई.
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट
मामले की जांच के लिए रिम्स के डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया था. रिपोर्ट में कहा गया कि मरीज पहले से कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे और अस्पताल में मानक चिकित्सा प्रोटोकॉल के अनुसार उपचार किया गया था. इस आधार पर अदालत ने कहा कि मेडिकल लापरवाही का प्रश्न तथ्यों की जांच से जुड़ा विवादित मुद्दा है इसे PIL में तय नहीं किया जा सकता. खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वह चाहें तो उचित अदालत या फोरम में मेडिकल लापरवाही का मामला मुआवजे का दावा दायर कर सकते हैं.
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