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हाईकोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी, पत्नी-बेटी के लिए 50 लाख स्थायी गुजारा भत्ता तय

Ranchi: हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के लंबे समय से चले आ रहे विवाद के मामले में फैसला सुनाते हुए पति को तलाक की अनुमति दे दी, लेकिन साथ ही पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए 50 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता (परमानेंट एलिमनी) देने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने यह आदेश गोपाल माईती की अपील में सुनाया. खंडपीठ ने परिवार न्यायालय जमशेदपुर के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी.

 

क्या कहा  हाईकोर्ट  ने 


हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी कई वर्षों से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंध व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुका है. इसलिए विवाह को समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है. हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि पति की जिम्मेदारी है कि वह पत्नी और बेटी के जीवन स्तर को बनाए रखे. कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह कुल 50 लाख रुपये एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में दे. यह राशि चार किस्तों में 12 महीने के भीतर देनी होगी.

 

पहली किस्त एक महीने के भीतर देनी होगी. 10 लाख रुपये बेटी के नाम बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कराने का निर्देश दिया गया है, जो उसकी पढ़ाई आदि के लिए होगा. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बेटी का पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार सुरक्षित रहेगा और वह कानून के अनुसार दावा कर सकती है.

 

क्या है मामला


याचिकाकर्ता गोपाल माईती और प्रतिमा माईती की शादी 28 अप्रैल 1998 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी. दोनों की एक बेटी भी है, जिसका जन्म 22 दिसंबर 1999 को हुआ. पति का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे. पत्नी का व्यवहार क्रूर हो गया और वह अक्सर विवाद करती थी.

पति के अनुसार वर्ष 1999 में पत्नी बेटी के साथ मायके चली गई और फिर वापस नहीं आई. पति ने यह भी बताया कि पत्नी ने उसके खिलाफ धारा 498ए सहित अन्य धाराओं में आपराधिक मामला दर्ज कराया, जिसमें वर्ष 2019 में अदालत ने उसे और उसके माता-पिता को बरी कर दिया. बाद में पत्नी ने भरण-पोषण का मामला दायर किया, जिसमें पति को 8,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया गया.

 

परिवार न्यायालय ने खारिज की थी याचिका


पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक के लिए परिवार न्यायालय में याचिका दायर की थी. हालांकि परिवार न्यायालय, जमशेदपुर ने 29 मई 2024 को यह याचिका खारिज कर दी थी.

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