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1990 के गोलीकांड में हाईकोर्ट ने बदली सजा, सात साल की जगह पांच माह 15 दिन की सजा

Ranchi News : हाईकोर्ट  ने लक्ष्मीकांत दास की ओर से दायर क्रिमिनल अपील पर फैसला सुनाया. लक्ष्मीकांत दास पहले से जमानत पर है, अदालत ने उसे जमानत बांड की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया.
 
झारखंड हाई कोर्ट

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1990 के एक गोलीकांड से जुड़े मामले में लक्ष्मीकांत दास की सजा में संशोधन किया है. अदालत ने धारा 307 आईपीसी और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत हुई सजा को बदलते हुए आरोपी को धारा 324/34 आईपीसी के तहत दोषी माना.

 

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पहले दी गयी सात वर्ष की सजा के स्थान पर अदालत ने आरोपी द्वारा जेल में बितायी गयी पांच माह 15 दिन की अवधि को ही सजा मान लिया. साथ ही आर्म्स एक्ट की धारा 27 के आरोप से उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया.

 

हाईकोर्ट ने लक्ष्मीकांत दास की ओर से दायर क्रिमिनल अपील पर फैसला सुनाया. लक्ष्मीकांत दास पहले से जमानत पर है, अदालत ने उसे जमानत बांड की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया.

 

दरअसल, यह मामला 13 जून 1990 का है. अभियोजन के अनुसार सरायकेला थाना क्षेत्र के घाघी गांव में घासीराम महतो और उसके भाई कंद्रू महतो अपने बाड़ी में बाउंड्री कर रहे थे. इसी दौरान लक्ष्मीकांत दास, अमूल्य कुमार दास और ज्ञानी दास वहां पहुंचे और बाउंड्री करने से मना किया. आरोप था कि अमूल्य दास ने तीर चलाया, जो निशाने पर नहीं लगा और इसके बाद लक्ष्मीकांत दास ने बंदूक से फायरिंग की. गोली के छर्रे लगने से घासीराम, कंद्रू और रंजीत महतो घायल हुए थे.

 

इस घटना को लेकर सरायकेला थाना में कांड संख्या 41/1990 दर्ज हुआ था. ट्रायल कोर्ट ने 16 अप्रैल 2003 को लक्ष्मीकांत दास को धारा 307 आईपीसी में सात वर्ष और आर्म्स एक्ट की धारा 27 में तीन वर्ष की सजा सुनाई थी. दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं. अमूल्य दास और ज्ञानी दास को भी धारा 307/34 आईपीसी में सात वर्ष की सजा मिली थी.

 

अपील की सुनवाई के दौरान अमूल्य दास और ज्ञानी दास की मृत्यु हो गयी. हाईकोर्ट के आदेश से उनके खिलाफ अपील समाप्त हो गयी और सुनवाई लक्ष्मीकांत दास के मामले तक सीमित रही.

 

हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में अभियोजन की ओर से 11 गवाहों की गवाही करायी गयी, लेकिन जांच अधिकारी को अदालत में पेश नहीं किया गया. घटना में घायल तीन लोगों ने गोली लगने की बात कही, लेकिन गोली लगने से संबंधित इंजरी रिपोर्ट रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी. डॉक्टर भी इंजरी रिपोर्ट के अभाव में घायलों की चोट की प्रकृति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके.

 

अदालत ने यह भी पाया कि मौके से छर्रे या खाली कारतूस बरामद नहीं हुए. अमूल्य दास के घर से बंदूक, लाइसेंस और एक खाली कारतूस जब्त किया गया था, लेकिन बैलिस्टिक रिपोर्ट के अभाव में जब्त हथियार को घटना में इस्तेमाल हथियार से जोड़ने का ठोस साक्ष्य नहीं था.

 

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर गौर किया कि बंदूक का लाइसेंस अमूल्य दास के नाम था. वहीं, अमूल्य दास ने अपने धारा 313 सीआरपीसी के बयान में कहा था कि उसने आत्मरक्षा में हवा में गोली चलायी थी. दूसरी ओर, अभियोजन के गवाहों ने गोली चलाने का आरोप लक्ष्मीकांत दास पर लगाया था.

 

मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 313 के तहत अभियुक्त को अपना बचाव स्पष्ट करने का महत्वपूर्ण अधिकार मिलता है और अदालत को उसके बचाव पर विचार करना आवश्यक है.

 

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि गोली चलने की घटना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि अभियुक्त पक्ष ने भी गोली चलने की बात स्वीकार की थी. लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों से यह निश्चित रूप से साबित नहीं होता कि गोली लक्ष्मीकांत दास ने ही चलायी थी. तीन अलग-अलग स्थानों पर छर्रे लगने और मौके से केवल एक खाली कारतूस मिलने के तथ्य को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना.

 

अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर धारा 307 आईपीसी के लिए आवश्यक मृत्यु कारित करने की मंशा या जानकारी लक्ष्मीकांत दास के खिलाफ स्थापित नहीं होती. हालांकि, गोली चलने की घटना और खतरनाक हथियार से चोट पहुंचने के आधार पर धारा 324/34 आईपीसी के तहत दोष सिद्ध माना गया.

 

आर्म्स एक्ट की धारा 27 के मामले में भी हाईकोर्ट ने लक्ष्मीकांत दास को संदेह का लाभ दिया. अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि फायरिंग उसी ने की थी, जबकि जब्त बंदूक का लाइसेंस अमूल्य दास के नाम था और उसने स्वयं फायरिंग की बात कही थी.

 

अदालत ने माना कि घटना वर्ष 1990 की है और आरोपी दो दशक से अधिक समय से मुकदमे का सामना कर रहा है. वह पहले ही पांच माह 15 दिन न्यायिक हिरासत में रह चुका है. इसलिए न्याय के हित में धारा 324 के तहत अधिकतम तीन वर्ष की सजा के मुकाबले पहले से भुगती गयी अवधि को ही पर्याप्त माना गया.

 

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2003 के ट्रायल कोर्ट के फैसले और सजा के आदेश को उक्त सीमा तक संशोधित करते हुए आपराधिक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया.

 

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