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बिना निगरानी चल रहे अस्पताल व ब्लड बैंक, संक्रमित रक्त मामले ने खोली प्रशासनिक खामियां

Ranchi: थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को HIV संक्रमित रक्त चढ़ाने की घटना ने पूरे राज्य को हिला दिया है. चाईबासा ब्लड बैंक में हुई इस गंभीर लापरवाही के बाद मंत्री से लेकर विभागीय अधिकारी सक्रिय तो दिख रहे हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में यह सड़न आखिर कितनी गहरी है और जिम्मेदार अफसर अब तक क्या कर रहे थे.

 

घटना के सामने आने के बाद पूरे राज्य में ब्लड बैंकों के लाइसेंस और संचालन की जांच के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर विभाग ने नियमित निरीक्षण और नियमन पहले से किया होता तो शायद मासूम बच्चों की जिंदगी के साथ ऐसा खिलवाड़ नहीं होता.

 

इसी के समानांतर एक और गंभीर प्रशासनिक प्रश्न उठता है. स्वास्थ्य विभाग पिछले सात साल से सोशल एक्टिविस्ट की RTI  पर जानकारी देने से बचता रहा है. उनसे राज्यभर के निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट (CEA) के तहत स्थिति पूछी गई थी.

 

कई बार अपील के बाद भी विभाग ने सिर्फ पत्राचार किया और जानकारी देने में देरी की. राजधानी रांची जैसे बड़े शहर में भी विभाग के पास यह स्पष्ट आंकड़ा नहीं है कि कितने अस्पताल और क्लिनिक CEA के तहत लाइसेंस प्राप्त हैं.

 

जिन जिलों से जवाब मिला, उनमें कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं

गोड्डा: 19 निजी व 9 सरकारी अस्पताल. बिना लाइसेंस संचालन की कोई सूचना नहीं.

 

• लातेहार: 13 निजी व 8 सरकारी अस्पताल. बिना लाइसेंस कोई नहीं.

 

• गढ़वा: 141 अस्पताल व क्लीनिक बिना CEA लाइसेंस संचालित पाए गए. इनमे 13 पर कारवाई करते हुए उन्हे बंद कर दिया गया है.  

 

 सरायकेला-खरसावां: 20 निजी संस्थान बिना CEA लाइसेंस संचालित पाए गए, सभी बंद कराए गए.

 

• पलामू: बिना लाइसेंस तीन अस्पताल बंद किए गए.

 

यह आंकड़े बताते हैं कि कुछ जिलों में कार्रवाई हुई है, जबकि कई जगहों पर न तो निरीक्षण हुआ और न ही पारदर्शिता है. इस बीच रांची जैसे प्रमुख जिले से अस्पष्ट जवाब मिलना सबसे गंभीर चिंता है, जहां सैकड़ों अस्पताल, लैब और ब्लड बैंक संचालित हैं.

 

आज जब थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने जैसी भयावह घटना सामने आई है, तब यह स्पष्ट हो गया है कि शासन से लेकर जिला स्तर तक स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक खामियां हैं. न नियमित निरीक्षण, न डेटा प्रबंधन और न ही जवाबदेही.

 

अब सवाल यह है कि-

क्या राज्य सरकार CEA नियमों को सख्ती से लागू करेगी?
क्या जिलों में सक्रिय निगरानी प्रणाली बनाई जाएगी?
क्या दोषी अधिकारियों और संचालकों पर कार्रवाई होगी?

 

क्योंकि अगर ऐसी घटनाओं से भी सख्त कदम नहीं उठे, तो यह भय हमेशा बना रहेगा कि अगला शिकार कौन होगा. झारखंड स्वास्थ्य व्यवस्था को सजग निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही की सख्त जरूरत है, वरना यह व्यवस्था मरीजों की नहीं, त्रासदी की जननी बनती रहेगी.

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