अखबारों में खबर है. पेपर लीक मामले में पीएम नरेंद्र मोदी ने बड़ी कार्रवाई की. कार्रवाई क्या है-शिक्षा सचिव विनीत जोशी का तबादला कर दिया गया. वह 1992 बैच के मणिपुर कैडर के IAS हैं. भाजपा नेता और उनके समर्थक इस खबर को खूब प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं. बता-जता रहे हैं कि बड़ी कार्रवाई हो गई. शांत हो जाइये. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना बंद कर दीजिए. शायद तबादले के इस कार्रवाई पर आप भी खुश हो रहे हैं, तो जरा रूकिये. IAS अधिकारी सुबोध कुमार सिंह को याद कर लीजिए.
1997 बैच के IAS सुबोध कुमार सिंह NTA के डीजी थे. NEET-UG 2024 पेपर लीक विवाद के बाद जून 2024 में केंद्र सरकार ने सुबोध कुमार सिंह को एनटीए डीजी के पद से हटा दिया था. उन्हें कुछ दिनों तक तो कंपल्सरी वेट पर रखा गया था. लेकिन बाद में उन्हें स्टील मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और फाइनेंशियल एडवाइजर बना दिया गया. दिसंबर में वह अपने मूल कैडर छत्तीसगढ़ लौट गये. फिर छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें पुरस्कृत करते हुए वहां के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का प्रधान सचिव बना दिया. जब इस पर विवाद हुआ तो उन्हें हटाकर उर्जा विभाग का सचिव बनाया गया.
विनीत जोशी की जगह जिन्हें शिक्षा सचिव बनाया गया है, वह हैं नरेश पाल गंगवार. ये वही IAS हैं जो जब पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में सचिव थे तब उनकी पत्नी, बेटे और मां को उनके ही मंत्रालय के अधीन आने वाले एक बोर्ड की योजना के तहत करीब 1.16 करोड़ रुपए की सब्सिडी मिली थी. है ना कमाल की बात. गड़बड़ी पकड़ी गई. विभाग बदल दो.
अगर पेपर लीक प्रकरण में आईएएस विनीत जोशी की गलती है, तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए. और अगर उनकी कोई गलती ही नहीं है, तो फिर उनका तबादला भी नहीं होना चाहिए. अगर बात सिर्फ जिम्मेदारी-जवाबदेही की है, तो फिर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को क्यों छोड़ा जाना चाहिए. वह तो छात्रों को दहशतगर्द कहने वाले शिक्षा मंत्री हैं.
दरअसल, ये तबादले कोई कार्रवाई नहीं. सजा तो बिल्कुल ही नहीं. असल में देश ऐसे ही चल रहा है. सरकारों के लिए गलत करने वाले या गैर जिम्मेदार ब्यूरोक्रेट्स सबसे अधिक दुलारें होते हैं. क्योंकि वह सत्ता के लिए जो चीजें जुटा सकते हैं, ला सकते हैं, पहुंचा सकते हैं, कर सकते हैं, वह कोई ठीक-ठाक (ईमानदार की बात तो करिये ही नहीं, वह शायद ही बचे हैं) अफसर नहीं करेगा. ना ही वह रबर स्टांप बनेगा. सरकारें व उनके समर्थक सिर्फ इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि ठीक है शोर-शराबा हुआ है, अफसर का तबादला कर दो. लोग शांत हो जाएंगे. लेकिन जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होगी, जिम्मेदार जवाबदेह नहीं बनेंगे.
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