- विधायक विक्सल कोनगाड़ी ने आदिवासी जमीन के लगातार हो रहे अवैध हस्तांतरण का मामला उठाया.
- रघुवर सरकार के समय आदिवासी जमीन के अवैध हस्तांतरण को लेकर एसआईटी बनी थी
- आदिवासी जमीन की रक्षा की जिम्मेदारी उपायुक्त (डीसी) पर है
त्वरित टिप्पणी
Pravin kumar
Ranchi : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सदन में विधायक विक्सल कोनगाड़ी ने राज्य में आदिवासी जमीन के लगातार हो रहे अवैध हस्तांतरण का गंभीर मामला उठाया.
उन्होंने पूरी संजीदगी के साथ कहा कि राज्य में आदिवासी जमीनों का स्वरूप बदला जा रहा है और उन पर मकान, मल्टी-स्टोरेज बिल्डिंग तक बन रहे हैं. इतना ही नहीं, इन भवनों का नक्शा भी पास हो रहा है,
विक्सल ने कहा, वहां बिजली और पानी के कनेक्शन भी दिये जा रहे हैं, जबकि मूल आदिवासी रैयत हाशिये पर जाते दिख रहे हैं. विक्सल का साथ विधायक राजेश कच्छप ने भी दिया. कहा कि कैसे बिजली और पानी के कनेक्शन के साथ नक्शे पास हो रहे हैं.
उन्होंने इस पर रोक लगाने की मांग की. इस पर विभागीय मंत्री ने भूमि वापसी को लेकर दखल दिहानी के प्रावधान का जिक्र किया.
लेकिन मामला इससे कहीं अधिक गंभीर है. सदन में मौजूद सभी माननीय इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) का राज्य में उल्लंघन हो रहा है.
कानून के अनुसार आदिवासी जमीन की रक्षा की जिम्मेदारी उपायुक्त (डीसी) पर है, लेकिन आखिर इस दायित्व का निर्वहन क्यों नहीं हो रहा है? यह बड़ा सवाल है.
सीएनटी एक्ट मूल रूप से खेती-बाड़ी की जमीन को संरक्षित रखने के उद्देश्य से बनाया गया था. आदिवासी रैयत भी जमीन का नेचर चेंज कर उस पर व्यावसायिक या बहुमंजिला भवन नहीं बना सकती, क्योंकि इससे जमीन की प्रकृति बदल जाती है.
वहीं धारा 46 में आदिवासी जमीन का हस्तांतरण एसटी से एसटी, बीसी से बीसी और एससी से एससी के बीच किये जाने का प्रवधान है. वह भी थाना और जिला क्षेत्र की बाध्यता के साथ. लेकिन इन प्रावधानों का भी गलत इस्तेमाल हो रहा है.
पूर्व की रघुवर दास सरकार के कार्यकाल में आदिवासी जमीन विचलन की जांच के लिए देवाशीष गुप्ता के नेतृत्व में एसआईटी गठित की गयी थी. उस समय विभागीय सचिव केके सोन हुआ करते थे.
रिपोर्ट को गंभीर बताते हुए उन्होंने कहा था कि आगे की कार्रवाई सरकार को तय करनी है, रघुवर सरकार ने इस मामले में रिपोर्ट आने के बाद खुद को पीछे कर लिया और रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गयी.
रांची जैसे शहरों का हकीकत
रांची जिले में ही 760 से अधिक दखलदिहानी के मामले लंबित हैं. पिछले 40-50 वर्षों में रांची के पुराने आदिवासी मोहल्ले सिमटते चले गये हैं. चडरी जैसी पुरानी आदिवासी बस्तियों में मूल निवासी अब सीमित दायरे में रह गये हैं.
कई इलाकों में जहां आदिवासी परिवारों के पास कभी 10-20 एकड़ जमीन हुआ करती थी, आज वे झोपड़ियों में रहने लगे है. आखिर इनकी जमीन कहां गयी.
स्पष्ट है कि जब तक सरकार और प्रशासन गंभीर इच्छाशक्ति नहीं दिखायेंगे, तब तक आदिवासी जमीन का विचलन नहीं रुक सकता. सदन में मामला उठाने के बाद भी यदि ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह कानून और संविधान की मंशा के साथ अन्याय होगा.
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