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किसी का छूटा स्कूल, किसी का छूटा शहर : झारखंड में किताबों से दूर हुए बच्चों को फिर स्कूल लाने की पहल

Ranchi News : विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना है, जो अपने अभिभावकों के साथ रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए हैं. सर्वेक्षण के दौरान पता चला कि कई परिवार दिल्ली और चेन्नई जैसे शहरों में पलायन कर चुके हैं. ऐसे में इन बच्चों का वर्तमान पता नहीं मिलने के कारण उनका दोबारा नामांकन कराना मुश्किल हो रहा है.
 
प्रतीकात्मक चित्र

Ranchi News : स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए झारखंड शिक्षा विभाग की ओर से अभियान चलाया जा रहा है. जनवरी 2026 में किए गए सर्वेक्षण में 6 से 18 वर्ष आयु वर्ग के कुल 501 बच्चों को स्कूल से बाहर पाया गया. 

 

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इनमें से 387 बच्चों का दोबारा विद्यालयों में नामांकन कराया जा चुका है. हालांकि, कई बच्चे अपने परिवार के साथ दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं, जिसके कारण उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने में परेशानी आ रही है.

 

सर्वेक्षण के अनुसार, 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग में स्कूल छोड़ चुके 291 बच्चों की पहचान की गई थी. इनमें से 257 बच्चों का दोबारा स्कूलों में नामांकन कराया गया है. वहीं, 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के 210 बच्चे स्कूल से बाहर पाए गए थे. इनमें से 130 बच्चों को फिर से विद्यालयों से जोड़ा गया है. इस प्रकार प्राथमिक और माध्यमिक स्तर को मिलाकर कुल 387 बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू कराने की पहल की गई है.

 

विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना है, जो अपने अभिभावकों के साथ रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए हैं. सर्वेक्षण के दौरान पता चला कि कई परिवार दिल्ली और चेन्नई जैसे शहरों में पलायन कर चुके हैं. ऐसे में इन बच्चों का वर्तमान पता नहीं मिलने के कारण उनका दोबारा नामांकन कराना मुश्किल हो रहा है.

 

तमाड़ प्रखंड में चलाए गए विशेष सर्वेक्षण के दौरान शिक्षा विभाग को बड़ी सफलता मिली. सितंबर 2026 में प्रखंड के 112 विद्यालयों में सर्वेक्षण किया गया था. इस दौरान स्कूल छोड़ चुके 11 बच्चों की पहचान की गई. विभाग ने सभी 11 बच्चों का विद्यालयों में नामांकन करा दिया. इस तरह तमाड़ में चिह्नित सभी बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ने में सफलता मिली.

 

सर्वेक्षण में बच्चों के स्कूल छोड़ने के पीछे कई कारण सामने आए हैं. इनमें अभिभावकों की उदासीनता, परिवारों का बार-बार स्थान बदलना और आर्थिक तंगी प्रमुख हैं. झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले और घुमंतू परिवारों के बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के साथ काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं.

 

इसके कारण उनकी पढ़ाई बीच में छूट जाती है. मेले-त्योहारों के दौरान भी कुछ परिवार अस्थायी रूप से दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं, जिससे बच्चों का स्कूल से संपर्क टूट जाता है.

 

आर्थिक परेशानियों के कारण कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के बजाय कमाई को प्राथमिकता देने लगते हैं. ऐसी स्थिति में कुछ बच्चे गुब्बारे बेचने, छोटे-मोटे काम करने और भीख मांगने जैसी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं. इससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती है और उनके दोबारा स्कूल लौटने की संभावना कम हो जाती है.

 

शिक्षा विभाग के अनुसार, स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की पहचान होने पर उन्हें उनके वर्तमान निवास के नजदीकी विद्यालय में दाखिला दिलाने का प्रयास किया जाता है. यह अभियान लगातार चलाया जा रहा है, ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे.

 

हालांकि, पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों को नियमित शिक्षा से जोड़े रखना अब भी एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में बच्चों की पहचान, पुनर्नामांकन और उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए लगातार निगरानी की जरूरत है.

 

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