Ranchi : झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूजे) के राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन विभाग की ओर से दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया. झारखंड में जनजातीय उत्थान : नीति, संस्कृति और सतत विकास के समन्वय से विकसित भारत 2047 विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया.
इस सम्मेलन में देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधार्थियों और नीति विशेषज्ञों ने भाग लेकर जनजातीय विकास, सांस्कृतिक पहचान और सतत विकास से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया.
सम्मेलन के मुख्य वक्ता विश्वभारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. बिद्युत चक्रवर्ती ने कहा कि जनजातीय समाज के विकास के लिए समावेशी शासन व्यवस्था बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि विकास की नीतियों में जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संरचना को शामिल किए बिना वास्तविक विकास संभव नहीं है. उन्होंने भील, संथाल, मुंडा और राजबंशी जैसे विभिन्न जनजातीय समुदायों पर किए गए अपने अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके इतिहास और सामाजिक विकास को समझना जरूरी है.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एक्सआईएसएस, रांची के निदेशक डॉ. जोसेफ मरियनस कुजूर ने कहा कि जनजातीय विकास के लिए सामुदायिक भागीदारी और सहभागी विकास की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जनजातीय समाज का समग्र विकास सुनिश्चित करना होगा.
विशिष्ट अतिथि डॉ. ऑरोरा मार्टिन, मोबाइल म्यूजियम ऑफ मॉडर्न-डे स्लेवरी की संस्थापक एवं इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सिक्योरिटी की उपाध्यक्ष ने जनजातीय विकास में लैंगिक समानता की भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकार, गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विकास प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाना आवश्यक है.
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रो. सारंग मेढेकर ने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा प्रदान करना ही नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण के लिए शोध और संवाद को बढ़ावा देना भी है. उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के उत्थान के लिए अकादमिक शोध और नीति निर्माण के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है.
सम्मेलन के संयोजक और राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार अग्रवाल ने कहा कि जनजातीय उत्थान के लिए नीति निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है. सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन प्रो. आलोक कुमार गुप्ता ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया. उन्होंने बताया कि मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष के कारण कुछ अंतरराष्ट्रीय विद्वान सम्मेलन में शामिल नहीं हो सके, हालांकि कई विशेषज्ञों ने वर्चुअल माध्यम से अपनी भागीदारी दर्ज कराई.
उद्घाटन सत्र के बाद नीतिगत हस्तक्षेप और विश्लेषण : जनजातीय मुद्दे, संस्कृति और उत्थान विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की गई. इसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि एवं केंद्रीय दक्षिण बिहार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. अनुज लुगुन, बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रवीण सिंह तथा झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सीमा ममता मिंज ने अपने विचार रखे. पैनल चर्चा की अध्यक्षता डॉ. नेहा तिवारी ने की.
चर्चा के दौरान वैश्वीकरण के प्रभाव, जनजातीय नीतियों में सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की कमी, जनजातीय भूमि, पहचान, अधिकार और शासन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से मंथन हुआ. डॉ. अनुज लुगुन ने अपनी कविताओं के माध्यम से झारखंड के जनजातीय समाज की समस्याओं और आकांक्षाओं को सामने रखते हुए प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया.
सम्मेलन के दौरान दो तकनीकी सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए विद्वानों एवं शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए. कार्यक्रम के अंत में डॉ. राजश्री पाधी ने धन्यवाद ज्ञापन किया.
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