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क्या यह झारखंड पुलिस के इकबाल के अंत की शुरुआत है!

हिमांशु की मौत से लोग आक्रोशित हैं. तीन पुलिसवाले निलंबित कर दिये गये हैं. कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे. लोग भी शांत हो जाएंगे. जमशेदपुर शहर सामान्य भी हो जायेगा, लेकिन पुलिस के प्रति लोगों का जो विश्वास टूटा है, उसका क्या होगा?
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लोग सुरक्षा के लिए पुलिस के पास जाते हैं. आम जनता यह जानती-मानती है कि पुलिस उसका संरक्षक है. पुलिस सर्व शक्तिमान है. अगर वह पुलिस के संरक्षण में है, तो उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता. अब कल्पना करिये अगर पुलिस के सामने ही, पुलिस की गाड़ी से उतार कर किसी युवक को चाकू से गोद दे, फिर इसे क्या कहेंगे. जमशेदपुर में यही हुआ है. हिंमाशु सिंह को पुलिस गाड़ी से खींच कर चाकू मारा गया. बाद में उसकी मौत हो गई.


हिमांशु की मौत से लोग आक्रोशित हैं. तीन पुलिसवाले निलंबित कर दिये गये हैं. कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे. लोग भी शांत हो जाएंगे. जमशेदपुर शहर सामान्य भी हो जायेगा, लेकिन पुलिस के प्रति लोगों का जो विश्वास टूटा है, उसका क्या होगा?


दरअसल, जमशेदपुर की घटना पुलिस के इकबाल के खत्म होने की शुरुआत है. यह उस विश्वास के दरकने की शुरुआत है, जिसमें आम लोग पुलिस की मौजूदगी को सुरक्षा समझते हैं. यह सही है कि पुलिस कोई शक्तिमान नहीं है. लेकिन उसका इकबाल होता है. उसकी हनक बोलती है. उसका इकबाल बोलता है. जब यही खत्म होने लगे, तब गलत करने वालों में पुलिस का डर खत्म होने लगता है. अपराधी स्वच्छंद हो जाते हैं, मनचले मनचढ़े पन जीते हैं और पुलिस दुबक जाती है.


दरअसल, इस सबकी शुरुआत ऊपर से ही हुई है. पूर्व डीजीपी के कार्यकाल में जो सिस्टम पटरी से उतरा वह आज भी बेपटरी नजर आ रहा है. उस वक्त जो गंध फैलायी गयी, वह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.  झारखंड पुलिस मुख्यालय को ही देख लें. एक-दो अफसर पूरे राज्य को संभाल रहे हैं. बाकी सबको आराम करने के लिए किनारे कर दिया गया है. जांच में डीएसपी के बाद सीधे एडीजी रैंक का अफसर है. एसपी, डीआईजी-आईजी इंवेस्टिगेशन से आउट.

 

एक अफसर तो जिला, सीआईडी, एटीएस, मुख्यालय सब संभाल रहे हैं. जैसे वह इंसान नहीं, सुपर कॉप नहीं, "सुपर मैन" हों. वैसे यह पद और पावर का क्लैश का भी मामला है. सूचनाओं पर पहरा है. गोपनीयता के नाम पर अंदरखाने खेल चलता है. सीआईडी इंवेस्टीगेशन करता है, मामलों का सिर्फ नंबर बताया जाता है. इंवेस्टीगेशन में क्या मिला? यह गोपनीय है. इस सूचना पर पहरा है. 


जिलों पर से मुख्यालय का नियंत्रण खत्म हो रहा है. जिला का एसपी प्रमंडल के डीआईजी, जोन के आईजी पर भारी पड़ रहा है. कई जिलों के एसपी काम नहीं कर रहे हैं. कुछ तो कारोबारी बन चुके हैं. कई जगह थानेदारों की पोस्टिंग में लाखों रुपये का लेन-देन हो रहा है. जैसे कोई निवेश करने का धंधा चल रहा हो. "सेवा ही लक्ष्य" के बदले "मेवा ही लक्ष्य" बनता जा रहा है. इतने लगाओ और उतने कमाओ. ऐसे में पुलिस का इकबाल का अंत होने से कोई नहीं रोक सकता है.

 

बहरहाल, आज के हालात पर एक पूर्व पुलिस अधिकारी (डीएसपी रैंक से रिटायर) की एक टिप्पणी याद आती है- उन्होंने कहाः जिस स्तर के अवैध काम करने वालों से वह थानेदार रहते हुए नहीं मिलते थे, मुंशी से मिलता था, वह सब अब एसपी के साथ बैठकी करता है. 

  
 

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