Ranchi: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान डुमरी विधायक जयराम महतो ने श्रम नियोजन, प्रशिक्षण विभाग और उद्योग विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान कई अहम मुद्दे उठाए. उन्होंने अपनी खराब सेहत के बावजूद सदन में उपस्थिति दर्ज कराई और झारखंड के श्रमिकों, नियोजन नीति और स्थानीय युवाओं के अधिकारों को लेकर जोरदार तरीके से अपनी बात रखी.
सदन में बोलते हुए जयराम महतो ने कहा कि वह बीमार हैं और पैरासिटामॉल की दवा खाकर सदन में आए हैं. उन्होंने विधानसभा की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि विधायकों को सवाल रात 1-2 बजे के बजाय रात 11 बजे तक उपलब्ध करा दिए जाने चाहिए, ताकि वे समय पर तैयारी कर सकें.
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उन्होंने झारखंड के निर्माण में श्रमिकों को अदृश्य नायक बताते हुए कहा कि राज्य के विकास में उनकी बड़ी भूमिका है, लेकिन उनके लिए ठोस योजना नहीं बनाई गई है. उन्होंने दिहाड़ी मजदूरों, रेहड़ी-पटरी कारोबारियों और टेंपो चालकों के लिए यूनिक वर्कर आईडी प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया, ताकि उन्हें बीमा, ईएसआई और पीएफ जैसी सुविधाएं मिल सकें.
प्रवासी मजदूरों के आंकड़ों पर भी उन्होंने सवाल उठाया. जयराम महतो ने कहा कि कोरोना काल में लगभग 12 लाख मजदूर झारखंड लौटे थे, लेकिन विभाग के पास इससे कम आंकड़े हैं. उनके अनुसार प्रवासी मजदूरों की संख्या 16 लाख से भी अधिक है.
नियोजन और बाहरी नियुक्तियों के मुद्दे पर उन्होंने गंभीर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में पद खाली हैं, लेकिन उन्हें भरा नहीं जा रहा है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2022 में 5.30 लाख पद सृजित थे, जो 2023 में घटकर 4.66 लाख रह गए. वर्तमान में लगभग 45 प्रतिशत पद रिक्त हैं.
जयराम महतो ने कहा कि जो नियुक्तियां हो रही हैं, उनमें बड़ी संख्या में गैर-झारखंडियों को अवसर मिल रहा है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सीएचओ की 220 अनारक्षित सीटों में से लगभग 150 राजस्थान के लोगों को मिलीं. इसके अलावा जेपीएससी और जेएसएससी की विभिन्न परीक्षाओं जैसे शिक्षक, टाउन प्लानर, फिटर और वेल्डर में भी गैर-झारखंडियों की बड़ी संख्या में नियुक्ति हुई है.
उन्होंने कहा कि नियोजन नीति स्पष्ट नहीं होने के कारण राज्य के कई युवा रोजगार से वंचित हैं और बहन-बेटियां दूसरे राज्यों में घरेलू कामगार बनने को मजबूर हैं, जबकि अन्य राज्यों के लोग यहां डॉक्टर और अधिकारी बनकर काम कर रहे हैं.
जयराम महतो ने भाषा के आधार पर परीक्षा लेने का सुझाव भी दिया. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(2) के अनुसार धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता, लेकिन भाषा के आधार पर स्थानीयता को प्राथमिकता दी जा सकती है. उन्होंने सुझाव दिया कि परीक्षाओं में झारखंड की स्थानीय भाषा, मुहावरे और लोकगीतों को शामिल किया जाए, ताकि राज्य की संस्कृति से जुड़े लोग ही सफल हो सकें.
मंईयां सम्मान योजना पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि योजना अच्छी पहल है, लेकिन केवल एक हजार रुपये देकर युवाओं को लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता. उन्होंने कहा कि जब 50 से 90 हजार रुपये की नौकरियां दूसरे राज्यों के लोगों को मिल रही हैं, तब स्थानीय युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर देने की जरूरत है. उन्होंने 60-40 नीति में बदलाव कर स्थानीय युवाओं के लिए अलग कोटा बनाने की संभावना पर भी विचार करने की बात कही.
निजी कंपनियों में स्थानीय युवाओं को 75 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर भी उन्होंने सरकार से मजबूत पहल की मांग की. उन्होंने कहा कि इस मामले में सरकार को अदालत में प्रभावी तरीके से पक्ष रखना चाहिए, ताकि राज्य के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार मिल सके.
साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि दूसरे राज्यों में काम के दौरान मृत होने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए डेथ सर्टिफिकेट बनाने की क्षेत्रीय बाध्यता खत्म की जाए, ताकि उनके परिजनों को मुआवजा मिलने में परेशानी न हो.
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