- जमशेदपुर में विशेषज्ञों का मंथन
Jamshedpur : झारखंड सहित देशभर में पर्वत श्रृंखलाओं और नदियों के बढ़ते संकट को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है. वक्ताओं ने कहा कि अविवेकपूर्ण अतिक्रमण, खनन गतिविधियों और जल संसाधन उपयोग की परियोजनाएं प्राकृतिक संरचनाओं के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुका हैं.

यह विचार 11 मई 2026 को जमशेदपुर में आयोजित एक सम्मेलन में सामने रखे गए. वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान में पर्वतों और नदियों के संरक्षण के लिए कोई समर्पित और सशक्त कानून मौजूद नहीं है.वन व पर्यावरण से जुड़े प्रावधानों के बावजूद पर्वतीय क्षेत्रों और जलस्रोतों की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा नहीं होने से संरक्षण कार्य कठिन हो गया है.
सम्मेलन में कहा गया कि इस समस्या का समाधान संविधान में निहित है और आवश्यकता इस बात की है कि भारत सरकार पर्वत और नदियों के संरक्षण के लिए एक व्यापक अधिनियम तैयार करे.इस मुद्दे पर विस्तृत विमर्श के लिए 22 और 23 मई 2026 को जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल सभागार में दो दिवसीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी. इसमें देशभर के विशेषज्ञ, पर्यावरणविद और संबंधित प्रतिनिधि शामिल होंगे. आयोजन जलपुरुष राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय के संरक्षण में किया जा रहा है.
आयोजकों के अनुसार, इस संगोष्ठी में पर्वत और नदियों के संरक्षण से जुड़े विधेयकों का प्रारूप तैयार किया जाएगा, जिन्हें आगे भारत सरकार को सौंपकर संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया के लिए प्रस्तुत किया जाएगा.वक्ताओं ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि हिमालय, पश्चिमी घाट, अरावली और अन्य पर्वत श्रृंखलाएं जलवायु परिवर्तन, खनन, वनों की कटाई और अवसंरचना विस्तार के कारण गंभीर संकट में हैं.
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि पर्वतीय क्षेत्रों को मुख्य संरक्षण क्षेत्र, विनियमित क्षेत्र और सतत उपयोग क्षेत्र में विभाजित किया जाए तथा बड़े पैमाने पर खनन, बांध निर्माण और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर कड़ा प्रतिबंध लगाया जाए.
नदियों के संदर्भ में वक्ताओं ने कहा कि अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन के कारण देश की कई नदियां अपना प्राकृतिक स्वरूप खो रही हैं. उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके पारिस्थितिक तंत्र के पुनर्जनन की व्यापक प्रक्रिया है.
सम्मेलन में यह भी सुझाव दिया गया कि स्थानीय स्तर पर नदी पंचायत जैसी व्यवस्थाएं बनाई जाएं ताकि जल स्रोतों की निगरानी और संरक्षण में जनभागीदारी सुनिश्चित हो सके.वक्ताओं ने कहा कि यदि समय रहते ठोस कानून और प्रभावी नीति नहीं बनाई गई तो आने वाले वर्षों में जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन और गंभीर रूप ले सकता है.
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