Jamtara News : विकास की चमक देखनी हो तो जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड अंतर्गत झिलुवा पंचायत के पीपलाटांड़ गांव पहुंच जाइए. गांव के चारों ओर पत्थर की खदानें और क्रेशर नजर आ जाएंगे, लेकिन गांव के भीतर विकास की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है.
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यहां आज भी ग्रामीण कच्ची सड़कों के सहारे जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं. खदानों और क्रेशरों की मौजूदगी के बावजूद पक्की सड़क और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए ग्रामीणों को इंतजार करना पड़ रहा है.

कच्ची सड़क
विडंबना देखिए, गांव के आसपास पत्थरों का कारोबार चल रहा है, लेकिन ग्रामीणों के हिस्से में पक्की सड़क नहीं आई. ग्रामीणों का आरोप है कि डीएमएफटी फंड और अन्य विकास योजनाओं के तहत भी गांव में सड़क निर्माण नहीं कराया गया.

पत्थर खदान
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब विकास योजनाएं गांवों तक पहुंचने के लिए बनाई जाती हैं, तो पीपलाटांड़ तक पहुंचते-पहुंचते उनकी रफ्तार आखिर धीमी क्यों पड़ जाती है?
गर्मी में चापाकल सूख जाते है, डाढ़ी बनती है पेयजल योजना!
गांव में चापाकल लगाए तो गए, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक अधिकांश गर्मी में चापाकल सूख जाते है. अब लोगों को खेतों में बनी डाढ़ी से अपनी प्यास बुझानी पड़ती है.

क्रशर
यानी सरकारी व्यवस्था में चापाकल मौजूद हैं, मगर प्यास बुझाने के लिए ग्रामीणों को दूसरे विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं. ग्रामीणों का सवाल है कि जब चापाकलों से पानी ही नहीं मिल रहा, तो स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था का दावा उनके लिए आखिर कितना मायने रखता है?
दोपहर होते ही पढ़ाई पर भारी पड़ती है ब्लास्टिंग
गांव की परेशानी सिर्फ सड़क और पानी तक सीमित नहीं है. खदानों में होने वाली ब्लास्टिंग ने स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर भी डर का साया डाल दिया है. बच्चों के अनुसार, स्कूल से महज 400 मीटर की दूरी पर दोपहर करीब एक बजे ब्लास्टिंग होती है.

ब्लास्टिंग से बच्चों में डर
स्कूल में पढने वाले बच्चे ने बताया सप्ताह में दो दिन ब्लास्टिंग होती है. लेकिन फिर से बगल में बंद पड़े एक और पत्थर खदान चालू कर दिया गया है. ब्लस्टिंग जिससे वे घबरा जाते हैं. शिक्षक का कहना है कि ब्लास्टिंग के दौरान बच्चे इतने डर जाते हैं कि उन्हें स्कूल से बाहर निकलना पड़ता है.
शिक्षक मैनेजर मुर्मू के मुताबिक, स्कूल भवन और गांव के कुछ घरों की दीवारों में भी दरारें पड़ी हैं. ग्रामीणों ने इन दरारों को ब्लास्टिंग से जोड़ते हुए चिंता जताई है. हालांकि, इसकी वास्तविक वजह की पुष्टि के लिए तकनीकी जांच जरूरी है.

पड़ी दरार
खदानों की गूंज सुनाई देती है, ग्रामीणों की आवाज कौन सुनेगा?
पीपलाटांड़ की तस्वीर कई सवाल खड़े करती है. एक ओर खदानों में पत्थर तोड़ने के लिए ब्लास्टिंग होती है, तो दूसरी ओर बच्चे डर के बीच पढ़ाई करने को मजबूर हैं. गांव में सड़क की कमी है, पेयजल संकट है और भवनों में दरार पड़ने की शिकायत भी सामने आ रही है.

पक्की सड़क के इंतजार में ग्रामीण
ग्रामीणों ने प्रशासन से पक्की सड़क बनाने, स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और खदानों में होने वाली ब्लास्टिंग की जांच कराने की मांग की है. अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इन शिकायतों को गंभीरता से लेकर कार्रवाई करता है या पीपलाटांड़ के ग्रामीणों को सड़क, पानी और सुरक्षित माहौल के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा.
सोचने की बात यह है कि खदानों और क्रेशरों से घिरे गांव में अगर ग्रामीणों को पक्की सड़क, स्वच्छ पानी और बच्चों को भयमुक्त माहौल तक नहीं मिल पा रहा है, तो विकास की योजनाओं का लाभ आखिर किसके दरवाजे तक पहुंच रहा है?
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