Ranchi News: वन भूमि के नाम पर 141.5 एकड़ जमीन पर माइनिंग बंद करने का आदेश देने के मामले में झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट में हार गयी है. हाईकोर्ट ने 2024 में ही BCCL के पक्ष में फैसला दिया था. साथ ही सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें वन भूमि बताते हुए 141.50 एकड़ जमीन पर माइनिंग बंद करने का आदेश दिया था.
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. न्यायाधीश संदीप मेहता और न्यायाधीश मनमोहन की पीठ ने सुनवाई के बाद राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी है. साथ ही यह टिप्पणी भी की है कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है. राज्य सरकार द्वा प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट बता कर 141.50 एकड़ जमीन पर माइनिंग रोकने का आदेश के मामले में BCCL के साथ वर्ष 2010 में कानूनी विवाद शुरु हुआ था. यह अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की हार के साथ समाप्त हुआ.
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राज्य सरकार ने 25 अगस्त 2010 को आदेश (3926) जारी कर BCCL को जामीडीह मौजा के 141.50 एकड़ जमीन पर माइनिंग बंद करने का आदेश दिया था. इसमें सरकार की ओर से यह कहा गया था कि यह प्रोटेक्टेड वन भूमि है. इस पर बिना अनुमति के माइनिंग किया जा रहा है. यह कानून गलत है. इसके बाद 17-8-2016 को संशोधित आदेश (388) जारी किया गया. इसमें प्लाट नंबर 437,230 और 419 को वनभूमि के दायरे से बाहर कर दिया गया.
BCCL ने दो अलग-अलग याचिकाएं दायर कर हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. एक याचिका 2010 में और दूसरी याचिका 2016 में दायर की थी. इसमें सरकार द्वारा जारी दोनों आदेशों को रद्द करने का अनुरोध किया गया था. BCCL की ओर से यह कहा गया था कि यह जमीन पहले बंगाल कोल कंपनी की थी. कई स्तर से होते हुए कोल नेशनलाइजेशन के समय यह जमीन केंद्र सरकार को कोयला मंत्रालय को हस्तांतरित की गयी. इस जमीन पर पहले से माइनिंग होता रहा है. अब इस पर BCCL द्वारा माइनिंग किया जा रहा है.
राज्य सरकार की ओर से सुनवाई के दौरान यह कहा गया था कि इंडियर फॉरेस्ट एक्ट 1927 की धारा 29(3) के तहत इसे प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट घोषित किया गया है. इसपर बिना अनुमति के माइनिंग करना गलत है. BCCL द्वारा इस जमीन पर बिना अनुमति के माइनिंग किया जा रहा था. इस मामले में कंपनी के प्रबंध निदेशक के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था.
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद अक्टूबर 2024 में फैसला सुरक्षित रख लिया. न्यायालय ने नवंबर 2024 में फैसला सुनाया और राज्य सरकार द्वारा जारी दोनों ही आदेशों को रद्द कर दिया. न्यायालय ने अपने फैसले में धारा 29(3) के तहत इस्तेमाल में हुई देर की आलोचना की. न्यायालय ने कहा कि कोल नेशनलाइजेशन अधिनियम 1973 के तहत माइनिंग किया जा रहा था. ऐसी परिस्थिति में राज्य सरकार द्वारा बिना जांच पड़ताल और रिपोर्ट लिये बिना फॉरेस्ट एक्ट 1927 की धारा 29(3) के हवाला देते हुए माइनिंग पर रोक लगाने का आदेश सही नहीं है.
हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा जारी किये गये दोनों आदेशों को रद्द कर दिया. हालांकि राज्य सरकार को जमीन के मालिकाना हक के मामले में सिविल कोर्ट में अपनी बात रखने की अनुमति दी. न्यायालय ने राज्य सरकार को यह अधिकार इसलिए दिया था क्योंकि सरकार ने बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 के प्रभाव के आधार पर मालिकाना हक का भी सवाल उठाया था.
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