Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने पूर्वी सिंहभूम जिले से जुड़े भूमि विवाद के मामले में दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट), 1908 के प्रावधानों के उल्लंघन में हुए कथित धोखाधड़ीपूर्ण या मिलीभगत वाले समझौता डिक्री के आधार पर आदिवासी रैयती भूमि पर कब्जे को वैध नहीं माना जा सकता. हाइकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी ने अनंता गौर की याचिका पर आदेश सुनाया.
मामला पूर्वी सिंहभूम के एमजीएम थाना क्षेत्र स्थित गौर डांगा मौजा की जमीन से संबंधित था. याचिकाकर्ता अनंता गौर उर्फ अनंत कुमार प्रधान और ईशान गौर उर्फ ईशान कुमार प्रधान ने भूमि सुधार उप समाहर्ता, दालभूम, जमशेदपुर के 29 जून 2006 के आदेश को चुनौती दी थी. इस आदेश से सीएनटी एक्ट की धारा 71-A के तहत दायर भूमि बहाली वाद को स्वीकार करते हुए जमीन को प्रतिवादी संख्या-5 ममता सिंह मुंडा के पक्ष में बहाल करने का आदेश दिया गया था.
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इसके बाद याचिकाकर्ताओं की एसएआर अपील और एसएआर रिवीजन भी खारिज हो गए थे. हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने इन तीनों आदेशों को चुनौती देते हुए जमीन को अपने पक्ष में बहाल करने की मांग की थी.
1967 से कब्जे का किया था दावा
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वे संबंधित जमीन पर वर्ष 1967 से शांतिपूर्ण और भौतिक कब्जे में हैं. वर्ष 1967 में दायर टाइटल सूट संख्या 791/1967 का समझौते के आधार पर निपटारा हुआ था. इसी आधार पर बाद में उनके नाम म्यूटेशन हुआ और लगान भी स्वीकार किया गया.
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि करीब 35 वर्षों तक कब्जे के बाद एसएआर मामला दाखिल किया गया, इसलिए धारा 71-A की कार्यवाही समय-सीमा से बाधित थी. उन्होंने यह भी कहा कि जमीन पर मकान बनाए जाने के कारण उसका स्वरूप छप्परबंदी भूमि में बदल गया है.
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