Ranchi News : मोरहाबादी मैदान स्थित बापू वाटिका के सामने 24 दिन पहले शुरू हुआ छात्र आंदोलन आखिरकार उस भावुक मुकाम पर पहुंचा, जहां संघर्ष की थकान के बीच हजारों छात्रों के चेहरों पर खुशी और आंखों में आंसू थे. यह सिर्फ एक आंदोलन की जीत नहीं थी, बल्कि उन माता-पिता के सपनों की भी जीत थी, जिन्होंने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी जिंदगी की कमाई और उम्मीदें लगा दी थीं.
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झारखंड में जेपीएससी, जेएसएससी समेत विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में छात्रों ने आवाज बुलंद की. इससे पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए आंदोलन के बाद झारखंड में भी परीक्षाओं की पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य को लेकर आक्रोश बढ़ता गया. देखते ही देखते एक-एक कर छात्र आंदोलन से जुड़ते चले गए.
इन छात्रों की पीड़ा केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं थी. मां-बाप की मेहनत की कमाई से स्कूल-कॉलेज और ट्यूशन की फीस भरना, प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म के लिए पैसे जुटाना, दिन-रात पढ़ाई करना और फिर बसों-ट्रेनों में घंटों सफर कर परीक्षा केंद्र तक पहुंचना. यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन चुकी थी. लेकिन परीक्षा के कुछ ही दिनों बाद पेपर लीक होने की खबर उनके वर्षों की मेहनत और भविष्य के सपनों पर पानी फेर देती थी.
सबसे ज्यादा दर्द उस वक्त होता था, जब थका-हारा परीक्षार्थी परीक्षा देकर घर लौटता, चैन की नींद सोता और अगली सुबह खबर मिलती कि परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो गया. यह खबर सिर्फ एक छात्र को नहीं तोड़ती थी, बल्कि उसके पूरे परिवार को भीतर तक हिला देती थी. उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके मां-बाप, जिन्होंने अपनी जिंदगी बच्चों के भविष्य के नाम कर दी, अपने बच्चों के सपनों को बिखरता देख अक्सर आंसू नहीं रोक पाते थे.
इसी दर्द और उम्मीद को लेकर छात्रों ने 24 दिनों तक सड़क पर संघर्ष किया. जयपाल सिंह मुंडा मैदान में स्वतंत्रता दिवस के दो दिन बाद का दृश्य भी बेहद भावुक कर देने वाला था. भविष्य संवारने की उम्मीद लिए छात्र वहां डटे थे. किसी ने अपनी जेब से एक-एक रुपया जोड़कर आंदोलन के लिए सहयोग किया, तो किसी ने पढ़ाई छोड़कर आंदोलन की राह पकड़ी.
इस दौरान छात्रों ने लाठियां खाईं, दर्द सहा, आंसू गैस का सामना किया. कई छात्रों पर केस दर्ज हुए. छात्रों को डराने की कोशिशें हुईं, यहां तक कि कई मौकों पर लाइट तक काट दी गई. लेकिन इन सबके बावजूद छात्रों ने अपनी मांगों से पीछे हटने से इनकार कर दिया.
फिर आया वह पल, जिसका इंतजार हजारों छात्र 24 दिनों से कर रहे थे
सोमवार रात मुख्यमंत्री की ओर से छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए टीडीएल द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय सामने आया. खबर मिलते ही आंदोलन स्थल का माहौल अचानक बदल गया. संघर्ष से थके चेहरों पर मुस्कान लौट आई. आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार ये आंसू दर्द के नहीं, राहत और खुशी के थे.
कुछ ही पलों में हजारों हाथों में तिरंगा लहराने लगा. ऐसा लग रहा था मानो लंबे संघर्ष के बाद छात्रों को अपने सपनों की आजादी मिल गई हो. किसी ने तिरंगे को सीने से लगा लिया, तो किसी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. चारों ओर भारत माता की जय और संघर्ष की जीत के नारों से वातावरण गूंज उठा.
24 दिनों तक जिन चेहरों पर चिंता, गुस्सा और दर्द दिखाई देता था, उन्हीं चेहरों पर उस रात उम्मीद चमक रही थी. यह दृश्य शायद इसलिए भी भावुक था, क्योंकि इन छात्रों ने सिर्फ परीक्षा रद्द कराने की मांग नहीं की थी. वे अपने उस भविष्य के लिए लड़ रहे थे, जिसके लिए उनके मां-बाप ने वर्षों तक अपनी इच्छाओं का त्याग किया था.
उनकी आंखों में छलकते आंसू मानो कह रहे थे. हमने हार नहीं मानी, इसलिए आज हमारे सपनों को फिर से जीने का मौका मिला है. यह 24 दिनों का आंदोलन शायद झारखंड के छात्र आंदोलनों के इतिहास में एक ऐसी कहानी बनकर दर्ज होगा, जिसमें लाठियों का दर्द भी था, आंसू गैस की जलन भी थी, मुकदमों का डर भी था और अंत में हजारों तिरंगों के बीच खुशी के आंसू भी थे. संघर्ष लंबा था, दर्द गहरा था, लेकिन उस रात छात्रों की आंखों में सिर्फ एक ही चीज थी. अपने भविष्य के लौट आने की खुशी.
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