Ranchi: झारखंड की जेल व्यवस्था इस समय गंभीर संकट से गुजर रही है. राज्य की जेलें अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक कैदियों को रखने को मजबूर हैं, जिससे सुरक्षा, स्वास्थ्य और सुधारात्मक व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है. उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, झारखंड की जेलों की कुल क्षमता करीब 18,000 कैदियों की है, जबकि पिछले एक साल पहले के आंकड़ों के अनुसार करीब 26,000 से ज्यादा कैदी बंद हैं. यानी औसतन 40 से 45 प्रतिशत तक ओवरक्राउडिंग की स्थिति बनी हुई है. हालांकि इस वर्ष कुछ कैदी कम हुए हैं.
पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार, राज्य की प्रमुख जेलों की बात करें तो बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा, रांची की क्षमता लगभग 3,500 है, लेकिन यहां 4800 से अधिक कैदी बंद हैं. धनबाद मंडल कारा की क्षमता करीब 1,200 है, जबकि यहां 2,000 के आसपास कैदी रखे गए हैं. इसी तरह हजारीबाग और बोकारो की जेलों में भी 30 से 60 प्रतिशत तक अधिक कैदी होने की स्थिति सामने आई है.
जेल विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कुल कैदियों में लगभग 50 प्रतिशत अंडरट्रायल (विचाराधीन) हैं, जिनका मामला अब तक अदालतों में लंबित है. यही ओवरक्राउडिंग की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंडरट्रायल मामलों का तेजी से निपटारा हो, तो जेलों पर दबाव काफी हद तक कम हो सकता है.
ओवरक्राउडिंग का सीधा असर कैदियों की स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ रहा है. कई जेलों में एक डॉक्टर पर सैकड़ों कैदियों की जिम्मेदारी है. दवाओं की कमी और सीमित मेडिकल सुविधाओं के कारण बीमार कैदियों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा.
सुरक्षा के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है. एक-एक जेलकर्मी पर 8 से 10 कैदियों की निगरानी का दबाव है, जिससे जेल के अंदर झगड़े, हिंसा और फरारी जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ गया है.
मानवाधिकार संगठनों ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए राज्य सरकार से जेलों का विस्तार, नए कारागार निर्माण और अंडरट्रायल कैदियों के मामलों में तेजी लाने की मांग की है. वहीं जेल प्रशासन का कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद हालात को संभालने की कोशिश की जा रही है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए नीतिगत फैसले जरूरी हैं.
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