Ranchi News: झारखंड की समृद्ध लोक कला, संगीत, नृत्य और पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की पहल शुरू की गई है. राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के अंतर्गत सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची 2026-27 में झारखंड की सांस्कृतिक परंपराओं को शामिल कराने की प्रक्रिया शुरू की है. इस सिलसिले में 15 अक्टूबर को रांची में आयोजित होने वाली राज्यस्तरीय बैठक में रांची विश्वविद्यालय के दो विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है.
आमंत्रित विशेषज्ञों में विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी एंड म्यूजियोलॉजी के सहायक प्राध्यापक अविनाश कुमार और परफॉर्मिंग एंड फाइन आर्ट्स विभाग के नृत्य शिक्षक विपुल नायक शामिल हैं. बैठक 15 अक्टूबर 2026 को अपराह्न 3:30 बजे धुर्वा स्थित एमडीआई भवन के तीसरे तल पर निदेशालय कार्यालय में आयोजित होगी.
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इस पहल का उद्देश्य झारखंड की पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहरों की पहचान कर उनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है. इसके तहत राज्य की लोक कलाओं, संगीत, नृत्य, लोक नाट्य, पारंपरिक शिल्प, लोक कथाओं और लोकोक्तियों जैसी सांस्कृतिक परंपराओं पर विचार किया जाएगा. यह प्रक्रिया यूनेस्को के 2003 के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण सम्मेलन के निर्धारित क्षेत्रों को ध्यान में रखकर की जा रही है.
बैठक में अविनाश कुमार पुरातात्विक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से झारखंड की प्राचीन परंपराओं, कलाकृतियों और सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण से जुड़े सुझाव देंगे. वहीं, विपुल नायक राज्य की पारंपरिक नृत्य शैलियों, लोक नाट्य और अन्य प्रदर्शन कलाओं की पहचान, संरक्षण तथा संवर्धन से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखेंगे.
रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सरोज शर्मा ने दोनों संकाय सदस्यों को इस महत्वपूर्ण पहल के लिए आमंत्रित किए जाने पर बधाई दी है. उन्होंने इसे विश्वविद्यालय परिवार के लिए गौरव का विषय बताया. कुलपति ने कहा कि झारखंड की लोक कला, नाट्य परंपराएं और ऐतिहासिक विरासत बेहद समृद्ध हैं. राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में राज्य की परंपराओं को स्थान दिलाने के प्रयास में विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की भागीदारी महत्वपूर्ण है.
उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों विशेषज्ञ अपनी शैक्षणिक और व्यावहारिक विशेषज्ञता के माध्यम से झारखंड की सांस्कृतिक विरासत के प्रामाणिक दस्तावेजीकरण तथा उसे व्यापक पहचान दिलाने में योगदान देंगे. इस राज्यस्तरीय बैठक में अन्य सांस्कृतिक विशेषज्ञों की भी भागीदारी होगी.
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