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झारखंड में नाबालिगों की तस्करी का जाल : 3 साल में 400 से अधिक रेस्क्यू, गरीबी और लालच बना वजह

  • दलालों का नेटवर्क सक्रिय
  • फर्जी दस्तावेजों से उम्र बदलने का खेल
  • नौकरी, शादी और पढ़ाई का झांसा देकर बच्चियों को दूसरे राज्यों में भेजा जा रहा
  • गरीबी का फायदा उठाकर मासूमों का सौदा

Ranchi :  झारखंड में बड़े पैमाने पर मानव तस्करी खेल जारी है. राज्य के अलग-अलग जिलों से बच्चियों को बहला-फुसलाकर दूसरे राज्यों में ले जाने और उन्हें बालिग बताकर बेचे जाने के कई मामले सामने आए हैं.

 

दलाल गरीबी, बेरोजगारी और जागरूकता की कमी का फायदा उठाकर परिवारों को परिवारों को झांसे में लेते हैं और बच्चों को नौकरी, शादी या बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर दूसरे राज्य ले जाते हैं. 

 

कई मामलों में शोषण, मारपीट, दुष्कर्म, जबरन मजदूरी और घरेलू बंधुआ काम की शिकायतें भी सामने आई हैं. तस्करी के शिकार कई बच्चों ने रेस्क्यू के बाद इस तरह की गंभीर घटनाओं का खुलासा किया है.  

 

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन वर्षों में रेलवे सुरक्षा बल और झारखंड पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर 400 से अधिक बच्चों को रेस्क्यू किया है, इनमें बच्चियों की संख्या सबसे अधिक है. 

 

पुलिस ने कई तस्करों को गिरफ्तारी भी किया है. लेकिन कुछ मामलों में तस्कर पुलिस के हाथ से बच भी निकलते हैं.  जांच में यह भी सामने आया है कि नाबालिग बच्चे और बच्चियों को दिल्ली, हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल सहित कई राज्यों में भेजा जाता है.

 

इन जिलों से सबसे ज्यादा मामले

सूत्रों के मुताबिक, रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, पलामू, गढ़वा, साहिबगंज, पाकुड़, दुमका, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों से तस्करी के अधिक मामले सामने आते हैं. दलाल गांव-गांव जाकर परिवारों को भरोसा दिलाते हैं कि उनके बच्चों को बड़े शहरों में नौकरी दिलाई जाएगी. कई मामलों में शादी का झांसा भी दिया जाता है.

 

नाबालिग को बालिग दिखाने का खेल

मानव तस्करी के मामलों में नाबालिग बच्चियों को फर्जी दस्तावेजों के जरिए बालिग दिखाने की भी बात सामने आई है. आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र में उम्र बढ़ाकर दिखा दी जाती है, ताकि जांच एजेंसियों को शक न हो. कई बार बच्चियों को इसकी जानकारी भी नहीं होती है. 

 

गरीबी और मजबूरी बन रही वजह

ग्रामीण इलाकों में आर्थिक तंगी के कारण परिवार जल्दी दलाल के झांसे में आ जाते हैं. दलाल 10 से 30 हजार रुपये तक एडवांस देकर बच्चे-बच्चियों को बाहर भेज देते हैं. इसके बाद कई परिवारों का अपने बच्चियों से संपर्क टूट जाता है और उन्हें अलग-अलग राज्यों में काम पर लगा दिया जाता है. 

 

दलालों का नेटवर्क और बढ़ती चुनौती

तस्कर गांव से बच्चों को लाकर जिला मुख्यालय या रांची पहुंचाते हैं, फिर ट्रेन या बस के जरिए दूसरे राज्यों में भेजते हैं. वहां पहले से मौजूद एजेंट उन्हें अलग-अलग जगहों पर घरेलू काम, फैक्ट्री मजदूरी या शादी के नाम पर सौंप देते हैं. स्कूल छोड़ चुके बच्चे और बच्चियां दलालों के निशाने में ज्यादा रहते हैं. 

3 सालों में 400 से अधिक नाबालिक बच्चे व बच्चियों का किया गया रेस्क्यू 

 

साल 2026 में अब तक इतने बच्चों का किया गया रेस्क्यू

9 जनवरी 2026 :   रांची रेलवे स्टेशन से सुरक्षा बल ने दो नाबालिग लड़कियों को संदिग्ध स्थिति में रेस्क्यू कर चाइल्डलाइन को सौंपा गया 

 

3 फरवरी 2026  :   बोकारो रेलवे स्टेशन से आरपीएफ ने चार बच्चों का रेस्क्यू किया. सभी को मजदूरी के लिए बाहर ले जाने की तैयारी थी. पुलिस ने एक संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार किया. 

 

26 फरवरी 2026  :  रांची रेलवे स्टेशन से दो बच्चियों को एक महिला के साथ पकड़ा गया. पूछताछ में पता चला कि बच्चियों को सिमडेगा से दिल्ली घरेलू काम के लिए ले जाया जा रहा था. पुलिस ने महिला को गिरफ्तार कर लिया और मानव तस्करी का मामला दर्ज किया. 

 

27 फरवरी 2026 : “ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते” के तहत रांची रेलवे स्टेशन से तीन लड़कियां समेत चार बच्चों को रेस्क्यू किया गया और बाल संरक्षण इकाई को सौंप दिया गया. 

 

7 मार्च 2026 :  जसीडीह-बेंगलुरु एक्सप्रेस ट्रेन से चार नाबालिग समेत पांच लोगों का रेस्क्यू किया गया. सभी को मजदूरी के लिए बेंगलुरु ले जाया जा रहा था.

 

बीते 2 सालों में भी कई बच्चे-बच्चियों को बचाया गया

 

17 नवंबर 2025 : टाटानगर स्टेशन से 13 नाबालिगों (12 लड़कियां) को रेस्क्यू किया गया. सभी को तमिलनाडु के सेलम में यार्न फैक्ट्री में काम के लिए भेजा जा रहा था. मौके से दो तस्करों को भी हिरासत में लिया गया. 

 

3 नवंबर 2025 :  झारखंड के 12 बच्चों को दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से रेस्क्यू किया गया. उन्हें घरेलू काम के लिए ले जाया जा रहा था और एक नाबालिग लड़की का फर्जी आधार बनाकर उसे बालिग दिखाया गया था.

 

14 अक्टूबर 2025 :  रांची रेलवे स्टेशन से तीन नाबालिग लड़कों को बचाकर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को सौंप दिया गया. बच्चों को गुमला से अगरतला ले जा रहे एक तस्कर को भी गिरफ्तार किया गया.

 

साल 2025 :  रेलवे सुरक्षा बल ने रांची डिवीजन (रांची, हटिया, मुरी, लोहरदगा) के विभिन्न स्टेशनों से 149 बच्चों को रेस्क्यू किया. इनमें कई बच्चों को तस्करी के शक में रोका गया और परिवार को सौंपा गया. 

 

4 अक्टूबर 2024 :  धनबाद स्टेशन के प्लेटफॉर्म 6 और 7 से छह नाबालिग बच्चों का रेस्क्यू किया गया. बच्चों को आंध्र प्रदेश और केरल ले जा रहे एक तस्कर को भी गिरफ्तार किया गया. 

 

8 अगस्त 2024 :  डाल्टनगंज रेलवे स्टेशन से 14 बच्चों को रेस्क्यू किया गया, जिनमें 12 नाबालिग थे. बच्चों को नोएडा की किसी फैक्ट्री में काम दिलाने के नाम पर ले जाया जा रहा था. एक आरोपी को भी गिरफ्तार किया गया. 

 

प्रशासन की चुनौती

रेलवे सुरक्षा बल और झारखंड पुलिस मानव तस्करी के खिलाफ लगातार अभियान चला रहे हैं. लेकिन तस्करों का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए ग्रामीण स्तर पर जागरूकता बढ़ाना, सख्त निगरानी और त्वरित कानूनी कार्रवाई बेहद जरूरी है. मासूम बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समाज, प्रशासन और परिवारों को मिलकर काम करना होगा, तभी इस गंभीर अपराध पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है. 

 

 

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