Ranchi News : खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक को लेकर झारखंड के संवैधानिक और वित्तीय हितों की रक्षा की मांग उठी है. झामुमो महासचिव फागु बेसरा ने राष्ट्रपति के समक्ष हस्तक्षेप मांग-पत्र प्रस्तुत कर विधेयक के उन प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा की मांग की है, जिनसे राज्यों की खनिज और खनिज-युक्त भूमि से संबंधित कराधान शक्तियां प्रभावित होने की आशंका है.
मांग-पत्र में कहा गया है कि संविधान ने संघ और राज्यों के बीच विधायी एवं वित्तीय शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया है. खनिज संपदा से जुड़े अधिकार भी इसी संघीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ऐसे में झारखंड जैसे खनिज-संपदा संपन्न राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए विधेयक का संवैधानिक परीक्षण आवश्यक है.
मांग-पत्र में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority & Anr. v. Steel Authority of India Ltd. & Ors. मामले में 25 जुलाई 2024 को दिए गए फैसले का विशेष उल्लेख किया गया है.
मांग-पत्र के अनुसार, संविधान पीठ ने बहुमत के फैसले में स्पष्ट किया था कि रॉयल्टी अपने आप में टैक्स नहीं है. साथ ही राज्य सूची की प्रविष्टि 50 के तहत राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति को मान्यता दी गई थी. वहीं, प्रविष्टि 49 के तहत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने के राज्य के अधिकार को भी अलग संवैधानिक क्षेत्र माना गया. पत्र में कहा गया है कि यह फैसला राज्यों के वित्तीय अधिकारों और देश के संघीय ढांचे की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है.
मांग-पत्र में संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 54 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि संसद को खनिजों के विकास और विनियमन से संबंधित कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है. हालांकि, खनिजों का विनियमन और राज्यों की कराधान शक्ति अलग-अलग संवैधानिक विषय हैं.
फागु बेसरा की ओर से मांग की गई है कि ऐसा कोई भी प्रावधान, जो राज्यों को संविधान से प्राप्त कराधान शक्ति के प्रभावी इस्तेमाल से वंचित करता हो या उसे अत्यधिक सीमित करता हो, उसकी संवैधानिक वैधता की गंभीरता से समीक्षा की जाए.
मांग-पत्र में कहा गया है कि झारखंड की अर्थव्यवस्था में कोयला, लौह-अयस्क और अन्य खनिज संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका है. खनिजों से मिलने वाला राजस्व राज्य के विकास, रोजगार, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण से सीधे जुड़ा हुआ है.
ऐसे में खनिज राजस्व से जुड़े राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले किसी भी केंद्रीय कानून का परीक्षण राज्य की वित्तीय स्वायत्तता और संघीय शक्तियों के संतुलन के आधार पर किया जाना चाहिए.
राष्ट्रपति से छह प्रमुख मांगें
1. MMDR संशोधन विधेयक 2026 में राज्यों की कराधान शक्तियों को प्रभावित करने वाले प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा कराई जाए.
2. सुप्रीम कोर्ट की 25 जुलाई 2024 की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले को ध्यान में रखते हुए विधेयक की समीक्षा की जाए.
3. राज्यों की वित्तीय एवं विधायी स्वायत्तता पर विधेयक के प्रभाव का परीक्षण कराया जाए.
4. झारखंड समेत खनिज-संपदा संपन्न राज्यों की निर्वाचित सरकारों और संबंधित हितधारकों से व्यापक परामर्श किया जाए.
5. यदि किसी प्रावधान से राज्यों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसे हटाने या संशोधित करने की कार्रवाई की जाए.
6. विधेयक से जुड़े संवैधानिक सवालों पर केंद्र सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण प्राप्त किया जाए.
'संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जरूरी'
मांग-पत्र में कहा गया है कि खनिज संपदा पर राज्यों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए और संघीय ढांचे की मर्यादा कायम रहनी चाहिए. साथ ही MMDR संशोधन विधेयक, 2026 के विवादित प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा किए बिना उन्हें प्रभावी नहीं किया जाना चाहिए.
पत्र में यह भी कहा गया है कि झारखंड समेत देश के खनिज-संपदा संपन्न राज्यों के नागरिकों की अपेक्षा है कि प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त राजस्व का उपयोग स्थानीय विकास और जनकल्याण में हो. राज्यों को संविधान से प्राप्त अधिकारों की रक्षा को भारतीय संघीय लोकतंत्र की मूल भावना से जोड़ते हुए राष्ट्रपति से आवश्यक संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग की गई है.
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