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प्रकृति की उपासना का पर्व करम पूजा, जावा को माना जाता अच्छी फसल का प्रतीक

Ranchi News: पर्व की शुरुआत जावा उठाने की परंपरा से होती है. आदिवासी बहनें नदी और तालाब से बालू लाकर उसमें मक्का, जौ, धान, तीसी, उड़द समेत आठ-नौ प्रकार के अनाज के बीज डालती हैं. उपवास रखकर जावा उठाया जाता है. इसी दिन से कई लोग सादा भोजन ग्रहण करते हैं.
 
सांकेतिक तस्वीर

Ranchi News: करम पर्व आदिवासी समाज का प्रकृति पूजा से जुड़ा प्रमुख पारंपरिक पर्व है. भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व में आदिवासी समाज अपने पूर्वजों की परंपराओं और रीति-रिवाजों को निभाते है. सुख-शांति और अच्छी फसल की कामना करते हैं. जगलाल पाहन ने बताया कि करम पर्व प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है.

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पर्व की शुरुआत जावा उठाने की परंपरा से होती है. आदिवासी बहनें नदी और तालाब से बालू लाकर उसमें मक्का, जौ, धान, तीसी, उड़द समेत आठ-नौ प्रकार के अनाज के बीज डालती हैं. उपवास रखकर जावा उठाया जाता है. इसी दिन से कई लोग सादा भोजन ग्रहण करते हैं.

 

अखड़ा में जावा को जगाने और उसकी देखभाल की परंपरा भी निभाई जाती है. जावा को अन्न और अच्छी फसल का प्रतीक माना जाता है. पर्व के दौरान जावा की पूजा और देखभाल के माध्यम से बेहतर कृषि उपज की कामना की जाती है. पौधों के उगने के बाद उन्हें पड़ोसियों के बीच बांटने की परंपरा भी रही है.

 

नवयुवकों द्वारा करम डाली लाने की भी परंपरा है. करम पेड़ से डाली काटने से पहले देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. इसके बाद पाहन के साथ करम डाली को अखड़ा में लाकर तीन बार भ्रमण किया जाता है. इस दौरान समाज की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है.

 

पाहन ने कहा कि पूर्वजों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. करम पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है.

 

जगलाल पाहन ने बताया कि आज कई जगहों पर अखड़ा की परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है. पहले अखड़ा में आदिवासी और सदान समाज के लोग एक साथ बैठकर सामाजिक विषयों पर चर्चा करते थे. नई युवा पीढ़ी को भी संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं की जानकारी यहीं दी जाती थी. लेकिन पश्चिमी संस्कृति की ओर बढ़ते झुकाव के कारण पारंपरिक अखड़ा संस्कृति प्रभावित हो रही है.

 

करम पर्व में भेलवा डाली का भी विशेष महत्व है.इस पर्व में भेलवा की डाली औषधीय रूप में उपयोगी होती है. इसे धान की खेत में गाड़ने की परंपरा है. क्योंकि इस मौसम में धान की फसल हरी-भरी रहती है. खेतो से धान निकलना शुरू हो जाती है. भेलना डाली गाड़ने से जल्दी कीड़े नहीं लगने की परंपरा से जोड़ा जाता है. इसके साथ सिंदवार डाली का भी उपयोग किया जाता है.

 

22 को करम पूजा हर्षोउल्लास से मनाया जाएगा.298 अखड़ों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. लाल पाड़ साड़ी औऱ धोती और गंजी में महिला-पुरुष सामूहिक रूप से नृत्य करेंगे. सभी अखाड़ों में तैयारी पूरी कर ली गई है. अखाड़ा तक पहुंचने के लिए सभी एप्रोच मार्गों को सुंदर लाईटों से सजाया गया है. 

 

सुबह चार बजे गांव के युवक युवती पारंपरिक वाद्ययंत्र के साथ करम डाली लाने जंगल की ओर रूख करेगें. दिन भर बहन भाई की लंबी आयु के लिए उपवास पर रहेगें. शाम में अखड़ा में करम देवता की आस्था से पूजा करेगें. पाहन द्वारा करमडाली को स्थापित करेगें. जावा फूल, मुर्गा, टिका सिंदूर और दिया करम डोली को अर्पित किए जायेगें.

 

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