- पुराने रिकॉर्ड और गलत विभाग के भरोसे चल रहा है विश्वविद्यालय का कामकाज
- पूर्व में 'लाइब्रेरी के सेंसस ऑफिस' में कार्यरत कर्मचारी असलम ईमाम का विभाग आदेश में 'ईडीपी सीओ' दर्शाया गया
- विश्वविद्यालय में आंतरिक संवादहीनता और प्रशासनिक तालमेल का पूरी तरह अभाव
Ranchi News : रांची विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा हाल ही में जारी किए गए तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग कर्मियों के स्थानांतरण (Transfer Order) आदेश में एक गंभीर प्रशासनिक चूक और बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है. विश्वविद्यालय द्वारा जारी हालिया आधिकारिक पत्र में यह स्पष्ट रूप से उजागर हो गया है कि शीर्ष अधिकारियों और कुलसचिव (Registrar) महोदय को स्वयं इस बात की पुख्ता जानकारी नहीं है कि उनके अधीन कार्यरत कर्मचारी वर्तमान में किस विभाग में अपनी सेवा दे रहे हैं.
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क्या है मामला?
विश्वविद्यालय द्वारा ज्ञापांक संख्या RU/R/8268/26 के तहत जारी किए गए स्थानांतरण आदेश में कर्मचारी असलम ईमाम का वर्तमान पदस्थापन स्थान 'ईडीपी सीओ, रांची विश्वविद्यालय' अंकित किया गया है. जबकि जमीनी हकीकत और पूर्व के आधिकारिक घटनाक्रम के अनुसार, असलम ईमाम को बहुत पहले ही 'Cencus Office in Library' (लाइब्रेरी के सेंसस ऑफिस) में स्थानांतरित और पदस्थापित किया जा चुका था.
प्रशासनिक लापरवाही और संवादहीनता की पराकाष्ठा
किसी भी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में किसी कर्मचारी का स्थानांतरण करने से पूर्व उसके वर्तमान कार्यस्थल और विभाग की समीक्षा की जाती है. परंतु रांची विश्वविद्यालय में बिना किसी आंतरिक जांच, बिना किसी अपडेटेड डेटाबेस और बिना किसी प्रशासनिक तालमेल के ही यह तुगलकी आदेश जारी कर दिया गया. एक विभाग से दूसरे विभाग में पहले से काम कर रहे कर्मचारी को किसी तीसरे पुराने विभाग का बताकर ट्रांसफर करना यह साबित करता है कि कुलसचिव कार्यालय पूरी तरह से अंधेरे में काम कर रहा है.
यह चूक महज एक मानवीय भूल नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय के भीतर सूचनाओं के आदान-प्रदान और आंतरिक संवाद की भारी कमी (Lack of Internal Communication) को दर्शाती है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय का स्थापना अनुभाग (Establishment Section) और कार्मिक रिकॉर्ड सिस्टम पूरी तरह से चरमरा चुका है, जहां कर्मचारियों के वर्तमान स्टेटस की कोई ससमय एंट्री नहीं हो रही है.
इस प्रकार की गंभीर त्रुटियों से न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि कर्मचारियों के वेतन भुगतान और उनकी कार्यकुशलता पर भी सीधा असर पड़ता है.
छात्र प्रतिनिधियों और जागरूक कर्मियों ने इस मामले पर गहरी आपत्ति जताई है और विश्वविद्यालय प्रशासन एवं कुलपति से मांग की है कि ऐसे गैर-जिम्मेदाराना आदेशों पर तुरंत रोक लगाई जाए, पुरानी गलतियों को सुधारा जाए और फाइलों की जगह वास्तविक स्थिति देखकर ही कोई भी नया प्रशासनिक निर्णय लिया जाए.
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