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किरीबुरु : कोयना नदी में करंट प्रवाहित तार की चपेट में आने से बैल की मौत

  • 11 हजार वोल्ट का तार टूट कर पानी में गिरा, ग्रामीण बाल-बाल बचे
Kiriburu (Shailesh Singh) : सारंडा स्थित छोटानागरा पंचायत अन्तर्गत जामकुंडिया गांव के समीप कोयना नदी में 11 हजार वोल्ट का करंट प्रवाहित बिजली तार टूटकर पानी में गिरने से बडा़ हादसा टला. इस दुर्घटना में सारंडा पीढ़ के मानकी सह जामकुंडिया गांव निवासी लागुडा़ देवगम का बैल की करंट लगने से मौत हो गई. मानकी लागुडा़ देवगम एवं मुंडा कुशो देवगम ने बताया की जामकुंडिया और राजाबेडा़ गांव के बीच से कोयना नदी गुजरी है. इस नदी का पानी में 11 हजार वोल्ट का करंट प्रवाहित तार टूटकर गिरा हुआ था. जब गांव का बैल नदी में पानी पीने गया तो करंट प्रवाहित तार की चपेट में आ गया जिससे उसकी मौत हो गई. इसे भी पढ़ें : देवघर">https://lagatar.in/deoghar-five-lakh-rupees-recovered-from-car-at-kadrasal-check-post/">देवघर

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उन्होंने बताया कि जहां यह घटना घटी है वहां दोनों गांव के ग्रामीण, महिलाएं व बच्चे स्नान, कपड़ा-बर्तन धोने अथवा नदी पार पर एक-दूसरे गांव आना-जाना करते हैं. लेकिन घटना के समय कोई नहीं था. अगर घटना के समय ग्रामीण नदी में रहते तो करंट की चपेट में आकर कइयों की मौत अथवा बडा़ हादसा हो सकती थी. इन्होंने कहा कि बिजली विभाग को ऐसे स्थानों पर सुरक्षा के उपाय अर्थात नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक बिजली तार पार हुआ है वहाँ करंट प्रवाहित तार के नीचे जाली डाल देना चाहिए ताकि तार टूटने पर भी वह जाली में हीं फंसा रह जाये. जिससे जानमाल की नुकसान नहीं पहुंचे. इसे भी पढ़ें : सुबह">https://lagatar.in/corporation-removed-encroachment-in-the-morning-shops-were-decorated-in-the-evening/">सुबह

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सारंडा के अशिक्षित मतदाता अपने ही प्रत्याशियों का बढ़ा सकते हैं सिरदर्द

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alt="" width="600" height="400" /> Kiriburu (Shailesh Singh) : नक्सल प्रभावित सारंडा के सुदूरवर्ती गांवों स्थित बूथों पर मतदान करने वाले अशिक्षित मतदाता हर बार की भांति इस बार भी तमाम प्रत्याशियों एंव उनके कार्यकर्ताओं का समीकरण बिगाड़ उनका सर दर्द बढा़ सकते हैं. सिंहभूम संसदीय सीट पर मुख्य मुकाबला एनडीए गठबंधन से भाजपा प्रत्याशी सह सांसद गीता कोडा़ एवं इंडिया गठबंधन से झामुमो प्रत्याशी सह पूर्व मंत्री व विधायक जोबा माझी के बीच होना है. दोनों के बीच कांटे का संघर्ष होने की संभावना जताई जा रही है. ऐसे में एक-एक वोट काफी महत्व रखता है. सारंडा के सुदूरवर्ती दर्जनों गांवों के वृद्ध व अशिक्षित मतदाता आज भी वोट डालने की तरीका को अच्छी तरह से नहीं जान व समझ पाये हैं. इसे भी पढ़ें : खेल">https://lagatar.in/the-game-is-such-that-now-even-the-pond-seems-like-a-playground-save-the-pond-sir/">खेल

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वह मतदान करने अपने-अपने बूथों पर तो जाते हैं, लेकिन जब अपने पसंद की प्रत्याशी के पक्ष में ईवीएम मशीन पर बटन दबाने की बारी आती है तो उन्हें समझ में नहीं आता है कि वह किस चुनाव चिन्ह के सामने वाला बटन दबाये. ऐसे में अनेक मतदाता नोटा से लेकर अन्य प्रत्याशियों के सामने का बटन दबाकर चले आते हैं, जिन प्रत्याशियों का कोई अस्तित्व या पहचान उनके गांवों में होती है. ऐसी स्थिति में अनेक बूथों पर नोटा अथवा ऐसे प्रत्याशियों को भी काफी मत पड़ जाते हैं जो कभी उस गांवों का दौरा कर मतदाताओं व ग्रामीणों से मिला नहीं होता है. जब मतगणना होता है तो वहाँ का रिजल्ट देख प्रत्याशी व उनके कार्यकर्ता सर पकड़ लेते हैं. इसे भी पढ़ें : धनबाद">https://lagatar.in/four-pairs-of-summer-special-trains-will-run-for-south-india-via-dhanbad/">धनबाद

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दूसरी समस्या यह हमेशा देखने को मिली है कि दर्जनों मतदाता के पास मतदाता पहचान पत्र तो होता है लेकिन मतदाता सूची में नाम नहीं रहता, या जिनका वोटर लिस्ट में नाम है लेकिन वोट देने से जुड़ी वह किसी भी प्रकार का पहचान पत्र लेकर नहीं आये अथवा वोटर लिस्ट में वह अपना नाम नहीं खोज पाये. ऐसी समस्याओं से परेशान मतदाता बिना मतदान किये वापस अपने घर लौट जाते हैं. ऐसे सुदूरवर्ती गांवों के मतदाताओं के घर घर तक बीएलओ द्वारा मतदाता पर्ची भी नहीं पहुंचाया जाता रहा है. कारण की अनेक ऐसे गांव हैं जहां जाने हेतु कोई रास्ता नहीं है, रास्ता है भी तो एक-दूसरे के घर अलग-अलग पहाड़ियों पर है. गर्मी में सभी के घरों तक मतदान पर्ची पहुंचाना संभव नहीं होता. इसे भी पढ़ें : देश">https://lagatar.in/jmm-which-is-enjoying-power-along-with-congress-which-imposed-emergency-in-the-country-remembered-dictatorship-pratul-shahdev/">देश

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नक्सल समस्या की वजह से विभिन्न दलों के प्रत्याशियों व सुदूरवर्ती गांवों के वोटरों के बीच किसी भी प्रकार का संवाद व सम्पर्क वर्षों तक नहीं रहना, जनप्रतिनिधि द्वारा भी ग्रामीणों के गांवों से हमेशा दूरी बनाकर रहना. ऐसे गांवों में सारंडा का थोलकोबाद, तिरिलपोसी, बिटकिलसोय, बालिबा, कोलायबुरु, कुदलीबाद, कुमडीह, उसरुईया, रांगरिंग, नुईयागडा़, बोड़दाभठ्ठी, होंजोरदिरी, झाड़बेडा़, टोंटोगडा़ दि गाँव है. इन गांवों के ग्रामीण नक्सल समस्या के लगभग 20 वर्षों बाद भी आज तक अपने गांवों में किसी भी पार्टी के बडे़ नेता व प्रत्याशियों को जाते नहीं देखा है. सिर्फ कुमडीह गांव में भारी सुरक्षा व्यवस्था व तमाम उच्च पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों की मौजूदगी व सीआरपीएफ की कडी़ सुरक्षा घेरा के बीच बीते वर्ष सांसद गीता कोडा़ व विधायक सोनाराम सिंकू एक बार कुमडीह, मारंगपोंगा गांव गये थे. हालांकि पूर्व मंत्री जोबा माझी हर वर्ष सारंडा के मर्चीगडा़, जुम्बईबुरु गांव सिर्फ स्थापना दिवस समारोह में शामिल होने जाती रही है. लेकिन सभी बडे़ नेता जुम्बईबुरु से आगे के गांवों में जाने से परहेज करते रहे हैं. [wpse_comments_template]

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