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केरल में लगा कुंभ मेला, दक्षिण गंगा के घाटों पर हजारों साधु लगा रहे आस्था की डुबकी

 Thiruvananthapuram :  उत्तर व मध्य भारत में आयोजित होने वाले कुंभ मेले से अलग एक कुंभ मेला इस साल केरल में भी चल रहा है. दरअसल यहां कई सालों बाद कुंभ मेले का आयोजन किया गया है.  


कुंभ मेला मलप्पुरम जिले के तिरुनावाया स्थित नव मुकुंद मंदिर के स्नान घाटों पर जारी है. यह वही स्थान है जहां पीढ़ियों से लोग पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूजा करते चले आ रहे हैं. अहम बात यह है कि इन घाटों से होकर बहने वाली भरतपुझा नदी दक्षिण गंगा के नाम से जानी जाती है. 

 
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 18 दिनों तक चलने वाले कुंभ मेले में हर दिन हजारों श्रद्धालु स्नान करने पहुंच रहे हैं. मेले का समापन 3 फरवरी को होगा.


खबरों के अनुसार यहां रात-दिन वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालु दक्षिण गंगा में डुबकी रहे हैं. शाम के समय भगवा वस्त्रधारी साधुओं का यहां जमावड़ा लगता है. काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारी वाराणसी के दशाश्वमेध घाट की तरह भरतपुझा नदी पर नील आरती कर रहे हैं.
 

महत्वपूर्ण बात यह कि मेले की मुख्य संरक्षिका माता अमृतानंदमयी हैं. केरल के देवस्वम मंत्री और सीपीआई (एम) नेता वीएन वासवन मेले को संरक्षकों में शामिल हैं. भारतीय धर्म प्रचार सभा और मोहनजी फाउंडेशन आयोजन से जुड़े हुए है.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि मेले के प्रमुख सूत्रधार स्वामी आनंदवम भारती हैं. यह जानना दिलचस्प होगा कि वे पहले सीपीआई (एम) स्टूडेंट विंग एसएफआई के नेता रह चुके हैं. उनक नाम पी सलील था. वर्तमान समय में वाराणसी स्थित श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े के संन्यासी हैं.


स्वामी भारती के अनुसार  तिरुनावाया में पूर्व से ऐसी परंपरा रही है. उसी संस्कृति और परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है.  स्वामी आनंदवम भारती ने कहा कि केरल में कई कारणों से हिंदू धर्म और उसकी परंपराएं धीरे धीरे खत्म होती जा रही थी. कुंभ मेला उसी धर्म-संस्कृति का पुनरुत्थान करेगा.   


जानकारी के अनुसार हजारों साधुओं का यहां आगमन हो चुका है. रेलवे वाराणसी और ऋषिकेश से एर्नाकुलम तक एक-एक विशेष ट्रेन चला रहा है.


स्नान करने आये स्वामी मुकुंदानंदगिरी ने कहा कि केरल सनातन धर्म के पालन में पीछे रह गया है यह कुंभ मेला यहां हालात बदलने वाला साबित होगा. मुकुंदानंदगिरी आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती स्थित ब्रह्मऋषि श्री ओंकार स्वामीगल मठ से जुड़े हुए हैं.
 

दक्षिण गंगा पर आयोजित होने वाले कुंभ मेले का इतिहास यह है कि 18वीं सदी तक तिरुनावाया में भरतपुझा नदी के किनारे हर 12 साल में मामांकम या महामाघम उत्सव होता था.


तत्कालीन शासकों जमोरिन और वल्लुवकोनाथिरी के बीच हुए खूनी युद्ध इस परंपरा के पीछे थे. कहा जाता है कि तीन सौ साल पहले कुंभ मेले वाली परंपर खत्म हो गयी. 2016 में नव मुकुंद मंदिर ने इसे माघ माह में नदी पूजा के रूप मे फिर शुरू किया.

 

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