Thane : महाराष्ट्र की सियासत में एक चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है. ठाणे जिले की अंबरनाथ नगर परिषद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने राज्य स्तरीय सहयोगी एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस और अजित पवार गुट की एनसीपी के साथ गठबंधन कर लिया है. इस गठबंधन का नाम 'अंबरनाथ विकास अघाड़ी' रखा गया है, जिसने शिवसेना के गढ़ में बड़ा झटका दिया है.
चुनाव परिणामों का संक्षिप्त विवरण:
कुल सीटें: 59
शिवसेना (शिंदे गुट): 27 सीटें (सबसे बड़ी पार्टी)
BJP: 14 सीटें
कांग्रेस: 12 सीटें
एनसीपी (अजित पवार गुट): 4 सीटें
निर्दलीय: 2
नगराध्यक्ष (मेयर) पद का चुनाव सीधे जनता से हुआ था, जिसमें BJP की तेजश्री करंजुले पाटिल ने शिवसेना की उम्मीदवार को हराकर जीत हासिल की थी. लेकिन पार्षदों की बहुमत के लिए पोस्ट-इलेक्शन गठबंधन जरूरी था.
गठबंधन की वजह: बहुमत
BJP ने कांग्रेस और एनसीपी (अजित पवार) के पार्षदों का समर्थन लेकर कुल 32 सीटों का बहुमत हासिल कर लिया. इससे शिवसेना, जो 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी और बहुमत से महज कुछ सीटें दूर थी, विपक्ष में बैठने को मजबूर हो गई. BJP पार्षद अभिजीत करंजुले पाटिल को इस अघाड़ी का ग्रुप लीडर बनाया गया है.
BJP का पक्ष : BJP नेताओं का कहना है कि शिवसेना ने कई बार गठबंधन की पेशकश को नजरअंदाज किया. साथ ही, शिवसेना के लंबे शासन में भ्रष्टाचार और धमकी की संस्कृति थी, जिससे मुक्ति दिलाने के लिए यह गठबंधन जरूरी था. BJP उपाध्यक्ष गुलाबराव करंजुले पाटिल ने इसे विकास के हित में बताया.
ये अनैतिक और अवसरवादी गठबंधन: शिवसेना
शिवसेना (शिंदे गुट) ने इसे 'अनैतिक और अवसरवादी गठबंधन' करार दिया है. अंबरनाथ से शिवसेना विधायक बालाजी किनीकर ने तंज कसा: "BJP एक तरफ 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा लगाती है, दूसरी तरफ सत्ता के लिए कांग्रेस से हाथ मिला लेती है." सांसद श्रीकांत शिंदे (उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के पुत्र और स्थानीय सांसद) ने कहा कि यह सवाल पूरी तरह BJP से है, वे बेहतर जवाब दे सकते हैं. शिवसेना ने यहां विकास कार्यों पर जोर दिया और BJP की वफादारी पर सवाल उठाया.
बड़ा सियासी संदेश
यह गठबंधन महायुति गठबंधन (BJP-शिवसेना-NCP) में दरार का संकेत दे रहा है. आने वाले बड़े नगर निगम चुनावों (जैसे BMC जनवरी 2026 में) से पहले यह घटना महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रही है. स्थानीय स्तर पर सत्ता की चाह में वैचारिक मतभेद भुलाए जा रहे हैं, जो 'राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं' की मिसाल है. यह घटना दिखाती है कि स्थानीय निकाय चुनावों में राज्य स्तर की सहयोगी पार्टियां भी एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं, और सत्ता हासिल करने के लिए अप्रत्याशित गठजोड़ बन सकते हैं. क्या यह महायुति में बड़ी दरार का संकेत है? आपकी राय क्या है?
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