Ranchi News : पानी की कमी और बारिश के बदलते मिजाज के बीच किसानों के लिए कम पानी में बेहतर उत्पादन करना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. इसे देखते हुए झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूजे) के सिविल अभियांत्रिकी विभाग की ओर से छोटानागपुर पठार क्षेत्र के जनजातीय किसानों के लिए गुरुत्व-आधारित सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया.
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प्रशिक्षण में 74 किसानों ने हिस्सा लिया. इस दौरान किसानों को तकनीक की जानकारी देने के साथ खेत में इसका व्यावहारिक प्रदर्शन भी कराया गया.
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीयूजे के कुलपति प्रो. सारंग मेढ़ेकर ने कहा कि बदलती जलवायु में किसानों के लिए पानी का सही इस्तेमाल बेहद जरूरी हो गया है. गुरुत्व-आधारित सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र के किसानों के लिए उपयोगी तकनीक बन सकती है.
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहना चाहिए. वैज्ञानिकों और शिक्षकों को किसानों के खेतों तक पहुंचकर उनकी वास्तविक समस्याओं को समझना चाहिए और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सरल एवं कम लागत वाली तकनीक विकसित करनी चाहिए. इससे पानी की बचत के साथ खेती की लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
कुलपति ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के साथ मिलकर अनुसंधान और तकनीकी विकास को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि किसानों के अनुभव और वैज्ञानिकों का ज्ञान साथ आने से स्थानीय स्तर पर अधिक उपयोगी समाधान तैयार किए जा सकते हैं.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अवनी कुमार सिंह, प्रमुख, आईसीएआर अनुसंधान परिसर पूर्वी क्षेत्र, पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्र कृषि प्रणाली अनुसंधान केंद्र, रांची ने कहा कि छोटानागपुर क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी क्षेत्रों से अलग हैं. यहां पानी का प्रबंधन खेती की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
उन्होंने गुरुत्व-आधारित सिंचाई प्रणाली को पठारी क्षेत्र के किसानों के लिए उपयोगी बताते हुए सीयूजे के साथ मिलकर स्वचालित सिंचाई प्रणाली के क्षेत्र में आगे शोध और काम करने का प्रस्ताव रखा. उन्होंने किसानों को आईसीएआर की विभिन्न कृषि अनुसंधान एवं किसान हितैषी योजनाओं की जानकारी भी दी.
कार्यक्रम में प्रो. जी.पी. सिंह, अधिष्ठाता, अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संकाय; प्रो. मनोज कुमार, अधिष्ठाता, अनुसंधान एवं विकास और डॉ. पी.के. परही, विभागाध्यक्ष, सिविल अभियांत्रिकी विभाग ने भी किसानों को संबोधित किया. विशेषज्ञों ने कहा कि बारिश का समय बदल रहा है और कई क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश नहीं होने की स्थिति बन रही है. वहीं, अचानक अधिक बारिश होने से पानी का बड़ा हिस्सा खेतों से बह जाता है. ऐसे में पानी को बचाकर जरूरत के समय फसलों तक पहुंचाना जरूरी है.
तकनीकी सत्र में डॉ. बिरेंद्र भारती ने सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के संचालन और रखरखाव की जानकारी दी. डॉ. शिखा चौरसिया ने गुरुत्व-आधारित सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली की अवधारणा, इसके उपयोग और छोटानागपुर के छोटे एवं सीमांत किसानों की जरूरतों के अनुसार इसके विकास की जानकारी दी. उन्होंने इसके मानकीकरण से जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा की. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची के डॉ. मिंटू जॉब ने किसानों को प्रणाली के डिजाइन और खेत में इसे लगाने से संबंधित बुनियादी जानकारी दी.
एस. के. झा, उप परियोजना निदेशक, आत्मा, कृषि विभाग, झारखंड सरकार ने किसानों को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना–प्रति बूंद अधिक फसल (PMKSY-PDMC) की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहायता और अनुदान उपलब्ध कराया जाता है. किसानों से संबंधित कृषि अधिकारियों से संपर्क कर पात्रता और सरकारी सहायता की जानकारी लेने की अपील की गई.
एचपीसीएल, यारा इंडिया और जैन इरिगेशन के प्रतिनिधियों ने कृषि उपकरणों के रखरखाव और सूक्ष्म सिंचाई के साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों के इस्तेमाल की जानकारी साझा की.
प्रशिक्षण के दौरान परियोजना के लाभार्थी किसान काली उरांव और शिबू उरांव ने अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने कम पानी में खेती और उत्पादन से जुड़े अनुभव बताए और खेतों में कीटों के प्रभाव में कमी आने की बात कही. किसानों ने मौके पर तकनीक का संचालन देखकर उससे जुड़े सवाल भी पूछे.
कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. शिखा चौरसिया ने HEFA द्वारा वित्तपोषित परियोजना की रूपरेखा, उद्देश्य और कार्ययोजना की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि परियोजना का उद्देश्य छोटानागपुर पठार क्षेत्र के किसानों के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल-कुशल सिंचाई व्यवस्था विकसित और मानकीकृत करना है.
समापन पर अमित के. यादव ने धन्यवाद ज्ञापन किया. उन्होंने कहा कि किसानों के लिए ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी है, जो सस्ती, सरल, कम पानी में काम करने वाली और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हों.
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