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एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा : गांव से निकलकर माओवादी संगठन के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने का सफर

झारखंड के गिरिडीह जिले के एक छोटे से गांव से निकला एक युवक समय के साथ देश के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में शामिल हो गया.  1 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा का नाम वर्षों तक झारखंड, बिहार, ओडिशा और आसपास के राज्यों में सक्रिय माओवादी गतिविधियों के प्रमुख चेहरों में लिया जाता रहा.
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मिसिर बेसरा

Ranchi : झारखंड के गिरिडीह जिले के एक छोटे से गांव से निकला एक युवक समय के साथ देश के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में शामिल हो गया.  1 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा का नाम वर्षों तक झारखंड, बिहार, ओडिशा और आसपास के राज्यों में सक्रिय माओवादी गतिविधियों के प्रमुख चेहरों में लिया जाता रहा. संगठन में वह भास्कर, सुनीर्मल, प्रधान जी और सागर जैसे कई छद्म नामों से भी जाना जाता था. उसके खिलाफ विभिन्न राज्यों में 200 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं.

 

   

मिसिर बेसरा का जन्म वर्ष 1960 में गिरिडीह जिले के मदनाडीह गांव में हुआ. शुरुआती शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए धनबाद पहुंचा. यहां राजनीति विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई के दौरान वह वामपंथी विचारों और उस समय के उग्र छात्र आंदोलनों के संपर्क में आया. झारखंड आंदोलन के दौर में उसकी वैचारिक सोच बदली और उसने माओवादी रास्ता चुन लिया.


युवावस्था में उसकी शादी मोनासी देवी से हुई और एक बेटा सिद्धार्थ हुआ. लेकिन 1980 के दशक में उसने परिवार छोड़कर माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर  का दामन थाम लिया. बाद में एमसीसी और पीपुल्स वॉर ग्रुप के विलय के बाद बने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में वह लगातार ऊंचे पदों तक पहुंचता गया. लंबे समय तक घर से दूर रहने के कारण उसकी पत्नी ने बाद में दूसरा विवाह कर लिया.


परिवार से दूरी इतनी बढ़ गई कि बेटा सिद्धार्थ भी बचपन के बाद अपने पिता से कभी नहीं मिल सका. उसके अनुसार, बचपन में पिता कुछ बार घर आए थे, लेकिन उसके बाद उनका कोई संपर्क नहीं रहा.


झारखंड बनने के बाद मिसिर बेसरा की भूमिका संगठन में और मजबूत होती चली गई. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वर्ष 2003 और 2004 में पश्चिम सिंहभूम जिले में हुए बड़े आईईडी हमलों की रणनीति तैयार करने में उसका नाम सामने आया. इन हमलों में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की जान गई थी. इसके बाद संगठन ने उसे केंद्रीय सैन्य आयोग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी और पूर्वी क्षेत्रीय नेटवर्क को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी सौंपी.


बताया जाता है कि उसने शीर्ष माओवादी नेता गणपति के साथ मिलकर झारखंड और आसपास के इलाकों में संगठन का प्रभाव बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. लंबे समय तक वह सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना रहा.


मिसिर बेसरा का नाम वर्ष 2009 के चर्चित लखीसराय जेलब्रेक मामले से भी जुड़ा. उस घटना में हथियारबंद माओवादियों ने अदालत ले जाए जा रहे कैदियों पर हमला कर उसे पुलिस हिरासत से छुड़ा लिया था. उस समय इस घटना ने देशभर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी थी.


करीब चार दशक तक भूमिगत रहकर सक्रिय रहने वाला मिसिर बेसरा भारतीय माओवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता रहा. उसका जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कैसे एक सामान्य छात्र वैचारिक कट्टरता और उग्रवाद की राह पर चलते हुए देश के सबसे वांछित माओवादी चेहरों में शामिल हो गया.


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