Ranchi : झारखंड की पारंपरिक मुंडा ज्वेलरी को अब भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है. नाबार्ड के नेतृत्व में स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सरकारी विभागों और तकनीकी संस्थानों के संयुक्त प्रयास से यह उपलब्धि हासिल हुई है.
GI टैग से क्या फायदा होगा?
GI टैग मिलने से मुंडा ज्वेलरी की विशिष्टता को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा और इसके नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. साथ ही कारीगरों को अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सकेगा. इस टैग से ज्वेलरी की विश्वसनीयता बढ़ेगी और राज्य की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक शिल्पकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी.
नाबार्ड झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीप्तिधारा घोष ने कहा कि यह उपलब्धि राज्य की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इससे जनजातीय कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ उनकी कला को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में भी मदद मिलेगी.
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