Jaipur News: खबर जयपुर के सीकर की है. पर इसकी चर्चा देशभर में हो रही है. दैनिक भास्कर की खबर है कि स्वास्थ्य विभाग में चपरासी बनने के लिए 24 सिपाहियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी. ऐसा क्या है कि सिपाही, जो थर्ड ग्रेड स्तर की सरकारी नौकरी है, वह फोर्थ ग्रेड की नौकरी पाने के लिए पहले से लगी नौकरी को छोड़ रहा है? वह भी कम वेतन पर.
युवाओं में यह बदलाव कैसे आ रहा है. इसके पीछे जो वजह है, वह सिपाही की नौकरी में ड्यूटी का दबाव और अफसरों का अमानवीय व्यवहार. इस खबर की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि सिपाही, जो वर्दी पहनते हैं, हाथ में हथियार का डंडा होता है, इसकी वजह से रौब होता है, वह सब अब उन्हें भारी लगने लगा है. क्योंकि बदले में उनसे जो छिन जाता है, वह है परिवार का साथ. लगातार 18-20 घंटे तक ड्यूटी. हर मौसम में सड़क पर खड़ा रहना या पुलिस वैन में बंद रहकर पेट्रोलिंग करना.

दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट
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आप झारखंड में ही देख लें. सिपाहियों के लिए क्या सुविधा है? न ढंग का सरकारी आवास, न उनके बच्चों के लिए ढंग का स्कूल, न उनके स्वास्थ्य के लिए ढंग का अस्पताल, न ही कठिन ड्यूटी के बदले मिलने वाला सम्मान. सीनियर अफसरों का अपनत्व तो शायद कभी-कभार मिल ही जाये, लेकिन समाज का क्या? सड़क पर उन्हें वसूली करने वाला समझा जाता है.
शायद सरकारों को याद नहीं. दो-तीन दशक पहले तक हर पुलिस लाइन में अस्पताल होता था. हजारीबाग में आरक्षी बाल विद्यालय था, जो कभी राज्य (एकीकृत बिहार) स्तर नेतरहाट व इंदिरा गांधी बालिका विद्यालय के बाद पर टॉप स्थान पर रहता था. आज क्या है सिपाहियों के लिए कुछ भी नहीं. आम लोग फुसफुसाकर गालियां देते हैं और विभाग के सीनियर चीख कर.
पुलिस लाइन से लेकर थानों तक सिपाहियों के लिए ठीक से बैठने तक की व्यवस्था नहीं है. रहने या परिवार की बात तो छोड़ ही दें. इन्हीं वजहों से सिपाही की नौकरी अब युवाओं को अच्छा नहीं लगता है.
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