Ranchi/Hazaribagh News: हजारीबाग के केरेडारी स्थित एनटीपीसी की चट्टी बरियातू कोयला खनन परियोजना को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने सख्त रुख अपनाया है. खनन क्षेत्र के पास रहने वाले विलुप्तप्राय आदिम जनजाति बिरहोर समुदाय की सुरक्षा और पुनर्वास में देरी पर आयोग ने जिला प्रशासन से जवाब मांगा है. आयोग ने हजारीबाग के उपायुक्त को दो सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करने और एक नवंबर तक विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है.
मामले में सबसे गंभीर पहलू बिरहोर समुदाय के आठ लोगों की मौत से जुड़ा है. शिकायत और प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, खनन शुरू होने के बाद समुदाय के लोगों की मौत के मामले सामने आए हैं. हालांकि इन मौतों के कारणों और खनन के साथ उनके प्रत्यक्ष संबंध की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. स्थानीय स्तर पर खनन से फैलने वाले प्रदूषण, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और मकानों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें भी उठाई गई हैं.

8 बिरहोरों के मौत की रिपोर्ट
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जांच समिति ने पुनर्वास से पहले खनन पर उठाए सवाल
चट्टी बरियातू कोयला खनन परियोजना 25 अप्रैल 2022 से संचालित है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर हजारीबाग के सदर एसडीएम के नेतृत्व में गठित संयुक्त जांच समिति ने क्षेत्र का निरीक्षण किया था. रिपोर्ट में पगार गांव के बिरहोर टोले के 33 घरों का उल्लेख है. इनमें खदान के नजदीक स्थित चार मकानों की स्थिति जर्जर बताई गई है. रिपोर्ट में ब्लास्टिंग से मकानों को नुकसान पहुंचने और धूल के कारण ग्रामीणों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां होने की बात भी सामने आई.

NHRC की ओर से डीसी को लिखा लेटर
जांच समिति ने बिरहोर परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास का सवाल उठाया था. समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, पुनर्वास सुनिश्चित किए बिना खनन गतिविधियां जारी रखना उचित नहीं है. इसके बावजूद खनन जारी रहने को लेकर आयोग ने चिंता जताई है.
आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उपलब्ध जांच रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि बिरहोर समुदाय के जीवन और कल्याण की तुलना में खनन को प्राथमिकता दी गई. आयोग ने एनटीपीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) से भी जवाब मांगा था कि जांच समिति की सिफारिशों के बावजूद खनन जारी रखने का आधार क्या था. भूमि अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव आकलन कराए जाने के संबंध में भी सवाल उठाए गए.
ढेंगा पुनर्वास कॉलोनी पर सहमति नहीं
बिरहोर परिवारों के पुनर्वास का मामला लंबे समय से लंबित है. प्रशासन और एनटीपीसी की ओर से बड़कागांव के ढेंगा क्षेत्र में पुनर्वास कॉलोनी विकसित करने का प्रस्ताव दिया गया था. हालांकि बिरहोर परिवारों ने वहां जाने को लेकर असहमति जताई है.
समुदाय के लोगों का कहना है कि उनका जीवन जंगल, पारंपरिक आजीविका और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है. वे ऐसी जगह बसना चाहते हैं, जहां उनकी परंपराएं और जीवनशैली बनी रह सके. ग्रामीणों की ओर से सलगा गांव या डुमरी प्रखंड से सटे वन क्षेत्र में पुनर्वास का विकल्प भी सुझाया गया है.
जिला प्रशासन ने इस संवेदनशील मामले का समाधान निकालने के लिए मानवविज्ञानी की मदद से योजना तैयार करने के वास्ते अतिरिक्त समय मांगा था. मार्च 2025 में उपायुक्त ने आयोग से समय देने का अनुरोध किया था. लेकिन 18 महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी पुनर्वास का स्थायी समाधान नहीं निकल सका है.
एक नवंबर तक कार्रवाई रिपोर्ट देने का निर्देश
आयोग के संयुक्त रजिस्ट्रार (विधि) इंद्रजीत कुमार की ओर से जारी आदेश में हजारीबाग के उपायुक्त को दो सप्ताह के भीतर पुनर्वास और सुरक्षा से संबंधित प्रगति बताने को कहा गया है. साथ ही एक नवंबर तक विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट एचआरसीनेट पोर्टल पर अपलोड करने का निर्देश दिया गया है.
अब निगाहें जिला प्रशासन और एनटीपीसी के जवाब पर हैं. सवाल यह है कि बिरहोर परिवारों को सुरक्षित स्थान पर बसाने की ठोस योजना कब लागू होगी और खनन से प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे. यह मामला केवल पुनर्वास का नहीं, बल्कि एक संकटग्रस्त आदिम जनजाति के जीवन, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा का भी है.
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