- हिरासत में मौत, गायब होने या हिरासत में दुष्कर्म केस की जांच केवल न्यायिक दंडाधिकारी ही कर सकते हैं, कार्यपालक दंडाधिकारी इसका विकल्प नहीं है
- जिन मामलों में हिरासत में हिंसा, लापरवाही या अस्वाभाविक मौत सामने आए, उनमें पीड़ित परिवारों को स्वतः मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए
- वर्ष 2018 से अब तक जिन मामलों में कार्यपालक दंडाधिकारी ने जांच की है, उसकी दोबारा न्यायिक जांच कराई जाए
- 262 मामलों में न्यायिक जांच क्यों नहीं हुई, जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई क्यों न की जाए
- सभी DC और SP को 30 दिनों के भीतर न्यायिक दंडाधिकारियों को जांच का अधिकार है
झारखंड जुडिशियल एकेडमी को चार माह के भीतर जांच की मानक प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने हिरासत में हुई मौतों के मामलों में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है. कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 (1-A) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196(2) का हवाला दिया है. जिसके तहत हिरासत में मौत, गायब होने या हिरासत में दुष्कर्म जैसे मामलों की जांच केवल न्यायिक दंडाधिकारी (Judicial Magistrate) ही कर सकते हैं.
कार्यपालक दंडाधिकारी (Executive Magistrate) द्वारा की गई जांच इसका विकल्प नहीं हो सकती. ऐसे कस्टडी में मौत और दुष्कर्म के मामलों में अनिवार्य रूप से न्यायिक जांच होनी चाहिए, ऐसा नहीं करना संविधान और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है.
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने आज इससे संबंधित मोहम्मद मुमताज अंसारी की जनहित याचिका पर अपना फैसला सुनाया. याचिकाकर्ता की ओर से मोहम्मद शादाब अंसारी ने पक्ष रखा था, जबकि राज्य सरकार की ओर से गौरव राज ने पक्ष रखा था.
वर्ष 2018 से 2025 तक झारखंड में हिरासत में 427 मौतें हुई
कोर्ट के समक्ष दाखिल राज्य सरकार के अनुपूरक हलफनामे में खुलासा हुआ कि वर्ष 2018 से 2025 तक झारखंड में कुल 427 हिरासत मौतें हुईं. इनमें से 262 मामलों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारियों से कराई गई, जबकि मात्र 225 मामलों में न्यायिक दंडाधिकारियों द्वारा जांच हुई. अदालत ने इन आंकड़ों में मौजूद विसंगति पर भी गंभीर सवाल उठाए.
निष्पक्षता के लिए न्यायिक अधिकारियों से जांच करने का है कानून
खंडपीठ ने कहा कि लगभग दो दशक पहले कानून में संशोधन कर यह व्यवस्था स्पष्ट कर दी गई थी कि ऐसी जांच निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक अधिकारियों से ही कराई जाएगी, क्योंकि पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के बीच “भाईचारे के संबंध” निष्पक्ष जांच में बाधा बन सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि सरकार प्रारंभ में हिरासत में मौतों के मुद्दे पर स्पष्ट जवाब नहीं दे रही थी.
लेकिन सरकार के शपथ पत्र में सामने आए आंकड़े प्रशासनिक विफलता की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं. कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया. कहा कि हिरासत में व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार का संवैधानिक दायित्व है और इसमें किसी प्रकार की ढील स्वीकार नहीं की जा सकती.
हाईकोर्ट ने सरकार को दिया दिशा निर्देश
खंडपीठ ने राज्य सरकार, गृह विभाग और जिला न्यायपालिका को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं. वर्ष 2018 से अब तक जिन मामलों में कार्यपालक दंडाधिकारी ने जांच की है, उनकी सूची तैयार कर दोबारा न्यायिक जांच कराई जाए.
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश और गृह विभाग के प्रधान सचिव 6 माह के भीतर रिपोर्ट दें कि 262 मामलों में न्यायिक जांच क्यों नहीं हुई और जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्यवाही क्यों न की जाए.
सभी DC और SP को 30 दिनों के भीतर स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं कि धारा 176(1-A) CrPC/196(2) BNSS के तहत जांच का अधिकार केवल न्यायिक दंडाधिकारियों को है.
हिरासत में मौत, गायब होने या दुष्कर्म की घटना होने पर 24 घंटे के भीतर नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन (NHRC), राज्य मानवाधिकार आयोग और संबंधित प्रधान जिला न्यायाधीश को सूचना देना अनिवार्य होगा.
झारखंड जुडिशियल एकेडमी को 4 माह के भीतर जांच की मानक प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया गया है. जिन मामलों में हिरासत में हिंसा, लापरवाही या अस्वाभाविक मौत सामने आए, उनमें पीड़ित परिवारों को स्वतः मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए.
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे मामलों में कानून के उल्लंघन को बर्दाश्त किया गया तो इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होगा और “कानून का शासन केवल कागजी अवधारणा बनकर रह जाएगा.”
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