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Opinion : अमृत काल या आफत काल, तेल में 4 रु वृद्धि और 10 रू टैक्स छूट के बाद भी उड़ता रूपैय्या

ना मुझे यह लिखने में अच्छा लग रहा है और ना ही आपके लिए पढ़ना सुखद होगा. पर सच यही है. देश का रूपया अब गिर नहीं रहा है, बल्कि लुढ़क रहा है. ऐसा लग रहा है, जैसे "उड़ता रूपैय्या". यह स्थिति तब है जब सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब 14 रुपये की बढ़ोतरी कर चुकी है. आपके मन में सवाल होगा कि बढ़ोतरी तो सिर्फ 4 रूपये के हुए हैं, तो 14 कैसे? इस तथ्य को मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं बतायेगा. वह बतायेगा कि सरकार में बैठे लोग महान हैं और वह हमें संकट से बचा रही है.
 

ना मुझे यह लिखने में अच्छा लग रहा है और ना ही आपके लिए पढ़ना सुखद होगा. पर सच यही है. देश का रूपया अब गिर नहीं रहा है, बल्कि लुढ़क रहा है. ऐसा लग रहा है, जैसे "उड़ता रूपैय्या". यह स्थिति तब है जब सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब 14 रुपये की बढ़ोतरी कर चुकी है. आपके मन में सवाल होगा कि बढ़ोतरी तो सिर्फ 4 रूपये के हुए हैं, तो 14 कैसे? इस तथ्य को मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं बतायेगा. वह बतायेगा कि सरकार में बैठे लोग महान हैं और वह हमें संकट से बचा रही है.

 

कारोबारी और सरकार का गुणगान में मग्न लोग भी यही बतायेंगे कि पेट्रोल-डीजल की कीमत 15-20 रुपये बढ़ना चाहिए. 3-4 रुपये प्रति लीटर बढ़ाकर मोदी सरकार आम लोगों को राहत दे रही है. जबकि सच अलग है, सरकार तो पहले से ही आम लोगों को चूस रही थी.

 

इस खेल को समझिये. दरअसल, ईरान युद्ध के बाद सरकार ने पेट्रोल आयात पर लगने वाले एक्साइज ड्यूटी को तीन रुपये व शून्य कर दिया. पहले यह पेट्रोल पर 13 रुपये और डीजल पर 10 रुपया प्रति लीटर लगता था. तो सरकार ने 10 रुपये की छूट पेट्रोलियम कंपनी को दी और चार रूपये का भार लोगों पर डाल दिया. इस तरह कुल मिलाकर पेट्रोलियम कंपनियों को 14 रुपये का लाभ हो रहा है. 10 रुपये की बढ़ोतरी इसलिए माना जाता है, क्योंकि अगर रकम सरकार के पास जाती तो वह घुम कर आम लोगों तक ही आती है. ले-देकर यह रकम भी पब्लिक पर ही आयेगा.

 

अब आते हैं रूपया पर. रुपया ऐतिहासिक रूप से टूट रहा है. पिछले एक हफ्ते में पांच प्रतिशत और इससे पहले के 11 महीनों में पांच प्रतिशत. यानी रुपये का गिरना पहले धीमा था और अब तेज. कुल मिलाकर हमारा रूपैय्या पिछले दो सालों से गिर रहा है. एक डॉलर अब 96.33 रुपये के बराबर हो गया है. विदेशी मुद्रा भंडार भी पिछले दो साल से गिर रहा है. युद्ध तो एक बहाना है, सिस्टम के निकम्मेपन को छुपाने का. जो हालात हैं, उसमें यह कह सकते हैं- हमें "अमृत काल" नहीं "आफत काल" में पहुंचा दिया गया है.

 

 

 

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