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नौकरी के नाम पर रिम्स में संगठित लूट, निदेशक ने बनाई जांच कमेटी, ACB से जांच की मांग

झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में एक गंभीर भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है. आरोप है कि आउटसोर्स व्यवस्था के तहत समानता एजेंसी द्वारा बहाल किए गए 75 से अधिक कर्मियों से नौकरी दिलाने के नाम पर अवैध रूप से लाखों रुपये की वसूली की गई है
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Ranchi : झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में एक गंभीर भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है. आरोप है कि आउटसोर्स व्यवस्था के तहत समानता एजेंसी द्वारा बहाल किए गए 75 से अधिक कर्मियों से नौकरी दिलाने के नाम पर अवैध रूप से लाखों रुपये की वसूली की गई है. इस मामले में रिम्स निदेशक को लिखित शिकायत सौंपकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से जांच कराने की मांग की गई है.

 


किसने की शिकायत और क्या हैं आरोप?

यह खुलासा शासी परिषद के सदस्य संजय सेठ के प्रतिनिधि द्वारा की गई शिकायत के माध्यम से हुआ है. शिकायत पत्र में आरोप लगाया गया है कि आउटसोर्सिंग के जरिए विभिन्न पदों पर नियुक्ति दिलाने के बदले अभ्यर्थियों से एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक की राशि वसूली गई. चौंकाने वाली बात यह है कि यह प्रक्रिया अब भी जारी बताई जा रही है.

 

शिकायतकर्ता का कहना है कि 

- कई युवाओं ने रोजगार पाने की उम्मीद में जमीन और गहने तक बेच दिए
- कुछ युवाओं ने कर्ज लेकर यह राशि चुकाई
- बेरोजगारी और सीमित रोजगार अवसरों का फायदा उठाकर युवाओं का आर्थिक शोषण किया जा रहा है
- आउटसोर्स व्यवस्था की आड़ में करोड़ों रुपये की अवैध उगाही करने वाला एक संगठित रैकेट सक्रिय है

किस एजेंसी पर है आरोप?

रिम्स में आउटसोर्स व्यवस्था के तहत मानव बल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी एम-एस सामंता सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को दी गई है. एजेंसी को कुल लगभग 1000 कर्मियों की नियुक्ति करनी है, लेकिन आरोप है कि जानबूझकर कई पद अभी भी खाली रखे गए हैं.

इन पदों पर लगाया गया वसूली का आरोप

- नर्सिंग स्टाफ
- कंप्यूटर ऑपरेटर
- वार्ड बॉय (मल्टी टास्किंग स्टाफ)
- लैब टेक्नीशियन
- लिफ्ट ऑपरेटर
- पैरामेडिकल स्टाफ
- अन्य सहयोगी कर्मचारी

शिकायतकर्ता का दावा है कि इन पदों के अलावा भी अन्य श्रेणियों में आउटसोर्स कर्मियों की तैनाती की गई है, जिसकी विस्तृत जांच आवश्यक है.


अधिकारियों को पहले से थी जानकारी, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई

शिकायत में यह भी गंभीर आरोप लगाया गया है कि इस कथित वसूली की जानकारी आउटसोर्स व्यवस्था से जुड़े कई अधिकारियों और कर्मचारियों को पहले से थी. रिम्स के तत्कालीन और वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों तक यह मामला मौखिक रूप से पहले भी पहुंचाया गया था, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई. शिकायतकर्ता ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो संस्थान की विश्वसनीयता और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएंगे.

पहले भी आ चुका है ऐसा मामला

यह पहली बार नहीं है, जब रिम्स में आउटसोर्स भर्ती में अनियमितता का आरोप लगा है. इससे पहले बुंडू ट्रामा सेंटर में आउटसोर्स भर्ती में पैसे लेने का मामला भी सामने आया था, जिस पर अभी कानूनी कार्रवाई जारी है. उस मामले में एक कर्मचारी अजय सेठ को पद से हटाया भी जा चुका है.

निदेशक ने गठित की जांच कमेटी

शिकायत मिलने के बाद रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार ने मामले की जांच के लिए एक जांच कमेटी का गठन किया है. हालांकि आरोपी समानता एजेंसी की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.एसीबी जांच के साथ ये मांगें भी रखी गईं, शिकायत पत्र में निम्नलिखित मांगें की गई हैं 

- पूरे मामले की जांच एसीबी, झारखंड से कराई जाए
- नियुक्ति प्रक्रिया, चयन सूची और भुगतान विवरण की जांच हो
- एजेंसी और अभ्यर्थियों के बीच लेन-देन की पड़ताल की जाए
- दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए
- पीड़ित अभ्यर्थियों को राहत और मुआवजा दिलाया जाए
- भविष्य में वसूली रोकने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित किया जाए

 

आउटसोर्सिंग व्यवस्था की पारदर्शिता पर उठे सवाल


स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि नियुक्ति के बदले पैसे लेने के आरोप सही साबित होते हैं तो इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा. योग्यता के बजाय धन के आधार पर चयन होने से मरीजों को मिलने वाली सेवाएं भी प्रभावित होंगी. विशेषज्ञों का सुझाव है कि आउटसोर्स एजेंसियों के चयन और नियुक्ति प्रक्रिया की नियमित ऑडिट होनी चाहिए.
शिकायत पत्र की प्रतिलिपि स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों तथा शासी परिषद के पदाधिकारियों को भी भेजी गई है.

 

 

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