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पूर्व सीएम चंपाई का हेमंत सरकार पर बड़ा हमला, कहा– रिम्स-2 के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश

Ranchi: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने रिम्स-2 के नाम पर रांची के नगड़ी में हो रहे भूमि अधिग्रहण को लेकर हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए पूर्व सीएम ने सरकार को 'आदिवासी विरोधी' करार दिया और आरोप लगाया कि पांचवीं अनुसूची और सीएनटी एक्ट के सुरक्षा कवच वाले क्षेत्र में भूमिपुत्रों को उनकी ही जमीन से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है.

 

चंपाई सोरेन ने तकनीकी और कानूनी तथ्यों को सामने रखते हुए सरकार के दावों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि सरकार जिस 1957-58 के भूमि अधिग्रहण की बात कर रही है, वह कभी पूरा ही नहीं हुआ था. तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने जनविरोध के बाद इस प्रक्रिया को रोक दिया था, जिसके बाद साल 2012-13 तक स्थानीय किसान इस जमीन की मालगुजारी (लगान) चुकाते रहे. उन्होंने 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013' का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि रैयतों को मुआवजा न मिला हो और जमीन पर सरकार का भौतिक कब्जा न हो (जहां आज भी खेती हो रही है), तो वह अधिग्रहण स्वतः रद्द समझा जाता है.


झामुमो का दामन छोड़ भाजपा में शामिल हुए वरिष्ठ नेता ने विस्थापन के पुराने जख्मों को कुरेदते हुए कहा कि एचईसी (HEC) ने 7,200 एकड़ जमीन ली थी, लेकिन प्लांट महज 500 एकड़ में बना. आज उसी जमीन पर हाई कोर्ट, विधानसभा और वीआईपी बंगले तान दिए गए, लेकिन मूल रैयतों को कोई पुनर्वास नहीं मिला. सोरेन ने सवाल उठाया कि जब सरकार के पास एचईसी की सैकड़ों एकड़ बंजर भूमि पहले से उपलब्ध है, तो नगड़ी की उपजाऊ कृषि भूमि को क्यों छीना जा रहा है?

 

चंपाई सोरेन ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि चाईबासा में बच्चों को संक्रमित खून चढ़ाने और रिम्स की दुर्दशा जैसी घटनाएं सरकार की नाकामी दर्शाती हैं. जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल और सरायकेला में उनके द्वारा बनवाए गए अस्पताल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार को इलाज से ज्यादा नई इमारतें खड़ी करने और जमीन लूटने में दिलचस्पी है.


पूर्व मुख्यमंत्री ने दोटूक लहजे में चेतावनी दी कि इस तानाशाही के खिलाफ राज्य भर के आदिवासी और मूलवासी एकजुट होकर नगड़ी में एक बड़ा 'महादरबार' लगाएंगे. लाखों लोग मिलकर अपनी जमीनों की रक्षा करेंगे और खेतों में हल चलाकर सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध करेंगे.

 

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