- 10 साल से अधिक समय से कर रहे थे काम
- नियमितीकरण के बजाय आउटसोर्सिंग करना उचित नहीं
- आउटसोर्सिंग से सरकार का नियंत्रण खत्म होने की आशंका
- 183 कर्मियों के नियमितीकरण का दिया गया हवाला
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने जेलों में स्वीकृत एवं स्थायी पदों पर आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से कर्मियों को नियुक्त करने के राज्य सरकार के फैसले को मनमाना, अवैध और असंवैधानिक करार दिया है. हाइकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने इस संबंध में 23 नवंबर 2021 को जेल महानिरीक्षक की ओर से जारी आदेश को रद्द कर दिया.
अदालत ने कहा कि लंबे समय से स्वीकृत पदों पर काम कर रहे दैनिक वेतनभोगी और संविदाकर्मियों को आउटसोर्सिंग के हवाले करने के बजाय उनके नियमितीकरण की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए. अदालत ने लक्समीकांत गुइन समेत 17 कर्मियों की ओर से दायर अलग-अलग रिट याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाया.
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मामले में लक्समीकांत गुइन वर्ष 2013 से तेनुघाट उपकारा में चालक के पद पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहे थे. रिकॉर्ड के अनुसार वह स्वीकृत पद पर कार्यरत थे. इसी तरह अन्य याचिकाकर्ता भी राज्य की विभिन्न जेलों में लंबे समय से दैनिक वेतन या संविदा के आधार पर काम कर रहे थे.
23 नवंबर 2021 को जेल महानिरीक्षक ने सभी केंद्रीय, मंडल एवं उपकाराओं के अधीक्षकों को पत्र जारी कर दैनिक वेतनभोगी कर्मियों की सेवाएं आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से लेने का निर्देश दिया था. याचिकाकर्ताओं ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि तीन मार्च 2021 के सरकारी संकल्प के तहत 183 कर्मियों की सेवाएं नियमित की गयी थीं. यह नियमितीकरण हाईकोर्ट के पूर्व के आदेशों के आलोक में किया गया था. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे भी इसी तरह लंबे समय से स्वीकृत पदों पर काम कर रहे हैं. इसलिए उन्हें नियमित करने के बजाय आउटसोर्सिंग एजेंसी के अधीन करने का फैसला उचित नहीं है.
मामले में नियुक्त अमिकस क्यूरी मनोज टंडन ने भी अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि जिन पदों पर याचिकाकर्ता कार्यरत हैं, वे स्वीकृत पद हैं. उन्होंने दलील दी कि स्वीकृत एवं रिक्त पदों को नियमित नियुक्ति से भरा जाना चाहिए और संवेदनशील स्थानों, विशेषकर जेलों में, आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मियों की नियुक्ति उचित नहीं है.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जेल संवेदनशील स्थान हैं. आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मियों पर सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं रहेगा. यदि कोई गंभीर कदाचार होता है, तो ऐसी स्थिति में सरकारी अधिकारियों के लिए कार्रवाई की स्थिति जटिल हो सकती है. इसलिए जेलों में स्वीकृत एवं स्थायी पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिये नियुक्ति की व्यवस्था उचित नहीं मानी जा सकती.
हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि रिकॉर्ड में वर्ष 2022 की एक फाइल नोटिंग से स्पष्ट था कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्ति के लिए प्रशासनिक विभाग ने कोई नीति निर्णय नहीं लिया था. इसके बावजूद 23 नवंबर 2021 को जेल महानिरीक्षक की ओर से ऐसा निर्देश जारी किया गया.
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता एक दशक से अधिक समय से काम कर रहे हैं और उनके काम या क्षमता को लेकर सरकार की ओर से कोई प्रतिकूल टिप्पणी सामने नहीं आयी है. इसके विपरीत उनकी सेवाएं लगातार बढ़ायी जाती रही हैं. ऐसे में उन्हें नियमित करने की दिशा में कदम उठाने के बजाय आउटसोर्सिंग के दायरे में डालना उचित नहीं है.
हाईकोर्ट ने 23 नवंबर 2021 के आदेश तथा उसके आधार पर लिये गये सभी निर्णयों को रद्द कर दिया. अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता तब तक संविदा/दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्य करते रहेंगे और उन्हें वही वेतन/मजदूरी मिलती रहेगी जो 23 नवंबर 2021 से पहले मिल रही थी, जब तक उनकी सेवाएं नियमित नहीं हो जातीं.
अदालत ने राज्य सरकार को 3 मार्च 2021 के संकल्प के तहत नियमित किये गये 183 कर्मियों के समान स्थिति में होने के आधार पर इन याचिकाकर्ताओं की सेवाओं के नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया. यह प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किये जाने की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी.
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