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मुस्लिम शासकों से अंग्रेजी हुकूमत तक का साक्षी रहा है पलामू, 1892 में बना जिला

134 वर्षों के इतिहास से विकास की राह तक का सफर


Rewti Raman 


Medininagar : पलामू जिला अपने गठन के 134 वर्ष पूरे कर चुका है. समृद्ध इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका और संविधान निर्माण में योगदान के साथ पलामू ने समय के साथ कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. झारखंड के ऐतिहासिक जिलों में शामिल पलामू न केवल प्रशासनिक, बल्कि राजनीतिक, सांस्कृतिक और सैन्य दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है. पलामू जिला का आधिकारिक गठन 1 जनवरी 1892 को हुआ था, लेकिन इसका इतिहास इससे कई शताब्दियों पहले मुस्लिम शासकों, स्थानीय जनजातीय राजाओं और बाद में अंग्रेजी हुकूमत से गहराई से जुड़ा रहा है.


वर्तमान में पलामू जिला प्रशासन व पुलिस व्यवस्था के लिहाज से तीन अनुमंडलों, 21 प्रखंडों और करीब 28 पुलिस इकाइयों में बंटा हुआ है. जिले का यह ढांचा कानून-व्यवस्था, विकास योजनाओं और प्रशासनिक संचालन को सुचारु रूप से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है.

 

अतीत से लेकर वर्तमान तक पलामू किला है जिले की पहचान

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चेरो राजाओं द्वारा पुराना और नया पलामू किला 17वीं शताब्दी में बनाया गया था. यह किला निर्माण के साथ ही जिले की पहचान बना रहा. मध्यकालीन युग में पलामू क्षेत्र मुस्लिम शासकों के अधीन रहा. 16वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य का विस्तार इस क्षेत्र तक हुआ. वर्ष 1589 में मुगल बादशाह अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने पलामू के चेरो शासकों को पराजित किया. इसके बाद यह इलाका मुगल शासन के अधीन आ गया.
मुगल काल में पलामू को ‘पलामोन’ के नाम से जाना जाता था. इस दौरान प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व संग्रह और सैन्य चौकियों का विकास हुआ. पलामू किला इस दौर की सैन्य गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा, जहां से आसपास के क्षेत्रों पर नजर रखी जाती थी. लातेहार के अलग होने के बाद पलामू किला लातेहार में चला गया, परंतु अब भी पलामू जिले की पहचान इसी किले से ही होती है. हालांकि, देखरख के अभाव में यह किला खंडहर में तब्दील होता जा रहा है. इसे देखने के लिए राज्य के साथ-साथ पूरे देश से सैलानी पहुंचते हैं.

 

अंग्रेजी शासन में हुए कई प्रशासनिक बदलाव

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब मुगल सत्ता कमजोर हुई, तब अंग्रेजों ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में पलामू को गया जिला के अंतर्गत रखा गया.1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुधारों की प्रक्रिया तेज की. वर्ष 1871 में जपला और बेलौजा जैसे क्षेत्रों को पलामू में शामिल किया गया. अंततः 1 जनवरी 1892 को पलामू को अलग जिला का दर्जा दिया गया और डाल्टनगंज को इसका मुख्यालय बनाया गया, जिसे आज मेदिनीनगर के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी शासन के दौरान यहां सड़क, राजस्व कार्यालय, पुलिस थाना और अदालतों की स्थापना की गई. डाल्टनगंज व्यापार और प्रशासन का केंद्र बनकर उभरा. कोयल नदी के किनारे बसे इस क्षेत्र में लकड़ी, वन उत्पाद और कृषि से जुड़ी गतिविधियों का विस्तार हुआ. अंग्रेजी शासन के दौरान ही पूरे देश के साथ जिले में रेलवे लाइन का विस्तार हुआ. रेलवे लाइन का विस्तार विकास के साथ-साथ विभिन्न स्थान से जुड़ाव का भी साधन बना.

 

नक्सली गतिविधियां और सामाजिक परिवर्तन

जिला गठन के बाद पलामू में प्रशासनिक गतिविधियों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विकास भी हुआ. पलामू को स्थानीय लोग पलाश, महुआ व लाह से भी जोड़ते हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यहां के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भाग लिया. आजादी के बाद पलामू ने कई राजनीतिक और सामाजिक बदलाव देखे. बाद के वर्षों में बड़े पलामू जिले का विभाजन कर गढ़वा और लातेहार जिलों का गठन किया गया. 90 के दशक में जंगलों और पहाड़ों की अधिकता होने के कारण यहां देश के अन्य हिस्सों के साथ नक्सलवाद की जड़े मजबूत हुईं. पलामू की पहचान दो दशकों तक पिछड़ापान, नक्सलवाद, पलायन के रूप में बनी रही. हालांकि नक्सलवाद जिले में अब अंतिम सांसें गिन रहा है. सुरक्षा बलों व जिला प्रशासन के समन्वय से धीरे-धीरे विकास की गति बढ़ रही है. इससे प्रशासनिक सुविधा तो बढ़ी, लेकिन पलामू आज भी सिंचाई, रोजगार, उद्योग और आधारभूत संरचना जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है.

 

आजादी व संविधान निर्माण में पलामू का ऐतिहासिक योगदान

आजादी की लड़ाई के दौरान नीलांबर-पीतांबर बंधुओं ने अंग्रेजों के खिलाफ सशक्त विद्रोह किया. उनके नेतृत्व में हुए संघर्ष ने ब्रिटिश शासन को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया. इसके अलावा पलामू के कई अन्य क्रांतिकारियों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के निर्माण में भी पलामू की भूमिका उल्लेखनीय रही. 1946 में संविधान सभा में कुल 292 सदस्यों में पलामू से यदुवंश सहाय और अमिय कुमार घोष सदस्य चुने गए थे. यदुवंश सहाय ने पेसा कानून की खुलकर वकालत की और आदिवासी समाज के अधिकारों की मजबूती से पैरवी की. उनके प्रयासों और तर्कों की बदौलत ही आगे चलकर पेसा कानून को लागू किया गया.

 

विकास, बदलाव और चुनौतियों के दौर से गुजर रहा पलामू

एक समय पिछड़े और नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में पहचाना जाने वाला पलामू अब प्रशासनिक सक्रियता, कानून-व्यवस्था में सख्ती और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ नई दिशा में आगे बढ़ रहा है. जिले में वर्तमान में डीसी, एसपी,एसडीएम डीएसओ समेत अन्य महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं आसीन हैं. जिला प्रशासन के आपसी तालमेल से डिजिटल व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है. वहीं, साइबर अपराध और अवैध गतिविधियों पर पुलिस की कड़ी कार्रवाई जारी है. नगर परिषद 2018 में नगर निगम का रूप ले चुका है, जिससे मुख्यालय और उसके विकास में काफी विस्तार हुआ है. शहरी और ग्रामीण इलाकों में पेयजल, सड़क व बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की कोशिश जारी है. मेदिनीनगर शहरी जलापूर्ति परियोजना जैसे कार्य भविष्य में लोगों की जीवन-स्तर सुधारने में अहम भूमिका निभाएंगे. हालांकि स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और सड़क सुरक्षा जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं, लेकिन समग्र रूप से पलामू भविष्य की संभावनाओं के साथ विकास की राह पर अग्रसर है.


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