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झूठ बोलने का अड्डा बनी संसद!

27 जून को अखबारों में खबर थी. खबर थी कि ऑपरेशन सिंदूर में जो छह जवान शहीद हुए थे, उनके नाम सार्वजनिक हुए हैं. सरकार ने शहीद जवानों का नाम दिल्ली स्थित नेशनल वार मेमोरियल (युद्ध स्मारक) लिखा. 13 महीने बाद देश को पता चला कि ऑपरेशन सिंदूर में छह जवान शहीद हुए थे.
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संसद में बोलते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

27 जून को अखबारों में खबर थी. खबर थी कि ऑपरेशन सिंदूर में जो छह जवान शहीद हुए थे, उनके नाम सार्वजनिक हुए हैं. सरकार ने शहीद जवानों का नाम दिल्ली स्थित नेशनल वार मेमोरियल (युद्ध स्मारक) लिखा. 13 महीने बाद देश को पता चला कि ऑपरेशन सिंदूर में छह जवान शहीद हुए थे.

 

ऑपरेशन सिंदूर के खत्म होने के बाद संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि एक भी जवान हताहत (शहीद) नहीं हुआ. उनके बयान पर संसद में एनडीए सदस्यों ने टेबल थपथपायी थी. क्या उनमें से कोई आज यह सवाल उठायेगा कि रक्षा मंत्री जी आपने झूठ क्यों बोला?


सवाल यह है कि रक्षा मंत्री ने संसद में झूठ क्यों बोला? क्यों ऑपरेशन सिंदूर में शहीद हुए जवानों को वह सम्मान नहीं मिला, जो कारगिल  या उससे पहले के युद्ध में मिला करता था. तब हजारों लोग उनके क्रियाकर्म में शामिल होते थे. उनके नाम पर घोषणाएं होतीं थी. कार्यक्रम होते थे. लोग शहीदों व उनके परिवार के प्रति सम्मान जताते थे. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद और उनके परिवार को इन सबसे वंचित रखा गया.


इससे पहले इसी सरकार ने डोकलाम घटना के बाद भी झूठ बोला था. शहीद जवानों के नाम व उनकी संख्या बहुत दिनों तक देश से छिपाया गया. बाद में देश को पता चला.


राजनाथ सिंह से पहले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का झूठ भी उजागर हो चुका है. उन्होंने संसद में बताया था कि पिछले सात सालों में किसी भी परीक्षा का पेपर लीक नहीं हुआ. पूरा देश और करोड़ों छात्र जानते हैं कि उनके कार्यकाल में कितने पेपर लीक हुए.

 

असल सवाल यह है कि क्या इस सरकार ने देश की संसद को झूठ का अड्डा बना दिया है? यह सरकार और इसके मंत्री इतना झूठ क्यों बोलते हैं? उन्हें किस बात का डर है? कौन झूठ बोलने का मानक तय करता है. बात युद्ध में जवानों के शहीद होने की हो या पेपर लीक की, झूठ बोलकर क्या हासिल करना चाहती है? क्या यही है राष्ट्रवाद का असली चेहरा? क्या हमारी संसद झूठ बोलने का अड्डा बन गयी है?

 

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