Sanjaya Kumar Singh
"ना खाउंगा, ना खाने दूंगा का सच
हर खजाने पर कोई चंपत या प्रधान"
मंदिर का चढ़ावा चुराया जाता रहा, पता नहीं चला. शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की गई. जिसकी जिम्मेदार है उसने आठ जून को वीडियो जारी कर कहा था, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का समय-समय पर आंतरिक ऑडिट होता है. इसमें ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक के प्रतिनिधि शामिल रहते हैं. ऑडिट कई दिन तक चलता है. वही कार्य आजकल हो रहा है. अभी तक कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई है.
अब एसआईटी की रिपोर्ट और ट्रस्ट की शिकायत पर एफआईआर हुई है. पहले भी हो सकती थी, नहीं होना चोरी को संरक्षण और मिलीभगत का मामला हो सकता है. और यह मंदिर-दान-चढ़ावा आस्था के मामले में हुआ है. जिसमें शक की गंजाईश भी नहीं होनी चाहिए थी. जनता को नहीं ही थी.
धर्मेन्द्र प्रधान
भ्रष्टाचारियों (या आरोपियों) को संरक्षण का खुला मामला. धर्मेन्द्र प्रधान के नेतृत्व में शिक्षा विभाग और मंत्रालय का जो हाल है उसमें धर्मेन्द्र प्रधान को हटा देना पहली और सामान्य जरूरत है. दिखावे के लिए ही सही. यह आश्वस्त करने के लिए कोई खा नहीं रहा है, किसी को खाने नहीं दिया जाएगा. पर ऐसा नहीं करने का एक ही मतलब है, ना खाउंगा, ना खाने दूंगा, दिखावा था, है और रहेगा.
कार्रवाई नहीं करने का कारण मिलीभगत हो सकता है वरना 2024 की जांच सीबीआई कर रही थी और 2026 में फिर लीक हो जाए, संभव नहीं है. सीबीआई का डर किन लोगों को नहीं है, बताना जरूरी नहीं है, समझना मुश्किल नहीं है.
शिक्षा का निजीकरण और व्यावसायीकरण
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का कमाल और उसके बाद सरकार में किसी का शर्मिन्दा न होना कोई बड़ी घोषणा या कार्रवाई न होना भविष्य के हालात का संकेत है. अब मोनाड यूनिवर्सिटी का मामला सामने आया है. फर्जी डिग्रियों के सत्यापन के लिए एक गोपनीय डेस्क बनाई गई थी. वहां पर जो डिग्री सत्यापन के लिए भेजी जाती थीं, उनको सत्यापित करके असली बता दिया जाता था.
हालांकि, कानूनी पेचीदगी से बचने के लिए यूनीवर्सिटी ने एक रिपोर्ट दर्ज करा दी थी कि उनका रिकार्ड रूम आग लगने से क्षतिग्रस्त हो गया है. यह जानकारी सीडीओ की अध्यक्षता वाली टीम की जांच में सामने आई. इस तरह शिक्षा की जरूरत ही नहीं रह जाएगी. हालत यह है कि एक मुख्यमंत्री ने अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा. उन्हें चुनौती है कि वे पढ़कर सुना दें. अर्थ-मतलब तो बहुत दूर. इसे संपादक को भी देखना चाहिए पर व्यवस्था ही ऐसी है.
डिजिटल अरेस्ट पर कार्रवाई
डिजिटल अरेस्ट करके हजारों लोगों से करोड़ों लूटे गए. सरकार ने नहीं के बराबर कार्रवाई की. अपराधी पकड़े नहीं गए. महीनों और शायद वर्षों लोगों को बचाने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया. लूटा गया माल नहीं के बराबर मिला. कार्रवाई की कोई खबर प्रचारित नहीं की गई. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया. सीबीआई जांच कर रही है.
छापे की खबर थी और साथ ही प्रधानमंत्री की चेतावनी. मुझे उनकी इस चेतावनी की टाइमिंग में राजनीति लग रही है. चाहता हूं मैं गलत होऊं पर उम्मीद नहीं है. प्रधानमंत्री जो अब बोल रहे हैं पहले बोले होते तो शायद हजारों लोग लुटने से बच जाते. नहीं बोले तो अब क्या मजबूरी है?
कौशल विकास मंत्रालय में लूट और सीएजी की रिपोर्ट
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) की स्थापना 9 नवंबर 2014 को युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार योग्य बनाने और देश में कुशल श्रमशक्ति की मांग-आपूर्ति के अंतर को कम करने के लिए की गई थी. प्रचार और वोट बटोरने के लिए बहुत अच्छा है. लेकिन हुआ क्या? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में 9,200 करोड़ रुपये से अधिक के भारी घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा किया है. 2015 से 2022 के बीच 1.32 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए 10,194 करोड़ रुपये जारी किए गए थे. किसे प्रशिक्षण मिला, कहां नौकरी मिली? अच्छा विज्ञापन हो सकता था लेकिन मिली होती तब ना?
भ्रष्टाचार का संदेह और संकेत
राजीव प्रताप रुडी 2014 से 2017 तक कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री रहे हैं. मई 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान बिहार के सारण से बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी के पैतृक आवास और कार्यालय परिसर में दर्जनों एंबुलेंस मिलने पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था. जन अधिकार पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव ने मौके पर पहुंचकर इनका खुलासा किया था.
महामारी के समय अस्पतालों में एंबुलेंस की भारी किल्लत थी, जबकि सांसद निधि से खरीदी गई लगभग 30 एंबुलेंस रूडी के अमनौर स्थित आवास और कार्यालय परिसर में भगवा कपड़े से ढंक कर खड़ी थी.
रूडी ने आरोपों का खंडन करते हुए बताया था कि ड्राइवर नहीं मिलने के कारण ये एंबुलेंस वहां खड़ी की गई थीं. यह तथ्य है कि कौशल विकास मंत्री के पास अपने चुनाव क्षेत्र में एंबुलेंस चलाने के लिए ड्राइवर नहीं थे. मुझे लगता है कि व्यवस्था की स्थिति बताने के लिए यह उदाहरण काफी है.
कौशल विकास का प्रचार और सच
04 जुलाई 2022 की खबर है कि सरकारी से निजी हुए एयर इंडिया ने सीधी भर्ती के लिए दरवाजा खोल दिया और उम्मीदवारों को महानगरों में इंटरव्यू के लिए बुलाया तो इंडिगो के कर्मचारियों ने सामूहिक छुट्टी ले ली और एयर इंडिया में इंटरव्यू देने के लिए लाइन लग गए. ऐसा दूसरी विमान सेवाओं के साथ भी हुआ होगा और विमान यात्रियों का बुरा हाल था.
मुद्दा यह है कि इतने साल से स्किल इंडिया और रोजगार के लिए लोगों को कौशल युक्त बनाने के कार्यक्रमों और प्रचार का क्या हुआ? नए उम्मीदवार क्यों नहीं रखे जा रहे हैं? पूर्व सरकारी विमान सेवा को यह इजाजत क्यों दे दी गई कि वह ऐसे विमान परिचालन को बाधित कर सके. जवाब तो आना नहीं है पर इससे आप हालात समझ सकते है. जोर से बोलिये राम नाम सत्य है.


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