- - जब अदालतें जागती हैं तो लोकतंत्र सांस लेता है
Gyanendra Awasthi
"BJP मुर्दाबाद" कहने पर जिला बदर? जज ने कहा: नागरिक गुलाम नहीं हैं. आज बॉम्बे हाईकोर्ट में कुछ असाधारण हुआ. एक जज ने वह कहा, जो शायद ही कभी किसी अदालत ने इतनी साफगोई से कहा हो. जस्टिस माधव जामदार ने कहा, "नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है. वे प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते. यह क्या है?"
मामला क्या था? Socialist Democratic Party of India के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी CAA और ज्ञानवापी विवाद के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे. मुंबई पुलिस ने उन्हें एक साल के लिए जिला बदर कर दिया. पांच FIR के आधार पर जो ज्यादातर सरकार विरोधी प्रदर्शनों के लिए थीं.
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जस्टिस जामदार ने यह आदेश देखा और आग बबूला हो गए. जज ने जो कहा, वह इतिहास में दर्ज होगा. "याचिकाकर्ता ने तो सिर्फ 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद, अमित शाह मुर्दाबाद जैसे नारे लगाए. नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए जिला बदर आदेश क्यों?" "पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सेवक नहीं है, वे जनसेवक हैं. मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाऊंगा." अगर लोग विरोध करें तो आप केस थोप देंगे. यह क्या है? नागरिकों का प्रदर्शन करना उनका अधिकार है.
और फिर, "वॉशिंग मशीन" वाली टिप्पणी. जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे "horse-trading" पर भी टिप्पणी की. उन्होंने कहा- "एक 10 साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में चर्चा हो रही थी कि Presiding Officer कैसे चुना जाए और वह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कैसे शिफ्ट हो गया. पूरे महाराष्ट्र में horse-trading चल रही है, केस बदलने पर विचार करें, वॉशिंग मशीन है."
इसके बाद अदालत ने फैसला सुनाया. जस्टिस जामदार ने अपने आदेश में लिखा- "सरकार के फैसलों का विरोध करने और उसके खिलाफ नारे लगाने मात्र से किसी नागरिक को जिला बदर नहीं किया जा सकता. यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है." जिला बदर आदेश रद्द किया जाता है.
यह फैसला इतना बड़ा क्यों है? आज के भारत में, जहां असहमति को देशद्रोह कहा जाता है. जहां विरोध प्रदर्शन पर UAPA लगाया जाता है. जहां "BJP मुर्दाबाद" कहने पर जिला बदर किया जाता है. एक जज ने खड़े होकर कहा, नागरिक गुलाम नहीं हैं. पुलिस प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है. विरोध करना अधिकार है. यह फैसला नजीर है. क्योंकि जब अदालतें जागती हैं, तो लोकतंत्र सांस लेता है.


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