- लापता बच्चे-बच्चियों को ढूंढ़ नहीं पा रही झारखंड पुलिस
- हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कहीं मिला नर कंकाल तो कहीं अब भी पुलिस के हाथ खाली
Ranchi : झारखंड में लगातार बढ़ रहे गुमशुदा बच्चों और बच्चियों के मामलों ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हालात ऐसे हैं कि कई मामलों में परिजन सालों तक थाने से लेकर एसपी कार्यालय के चक्कर काटते रहे. लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी.
लेकिन जब मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा और अदालत ने फटकार लगाई, तब जाकर पुलिस हरकत में आई. इसके बाद कुछ मामलों में नर कंकाल बरामद हुए. हालांकि कुछ मामलों में आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका है.
बोकारो में लड़की लापता, हाई कोर्ट की सख्ती के बाद मिला कंकाल
करीब 9 महीने पहले बोकारो से एक नाबालिग लड़की के लापता होने का मामला सामने आया था. परिवार वालों ने थाना से लेकर एसपी कार्यालय तक गुहार लगाई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
सिस्टम से हार मानने के बाद आखिरकार परिजन हाईकोर्ट के दरवाजे पर पहुंचे. मामले में कोर्ट की सख्ती और हस्तक्षेप के बाद पुलिस एक्टिव हुई और बाद में एक नर कंकाल बरामद किया गया.
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में देरी और शुरुआती जांच में लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की थी. इसके बाद कुछ पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी की गई.
गुमला से 2018 में लापता बच्ची का अब तक नहीं मिला सुराग
गुमला जिले का मामला राज्य के सबसे चर्चित मामलों में शामिल है. वर्ष 2018 में लापता हुई 6 साल की बच्ची का आज तक कोई पता नहीं चल पाया है. परिजन लगातार न्याय की गुहार लगा रहे हैं.
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने पुलिस जांच पर गंभीर नाराजगी जताई और अधिकारियों से जवाब भी तलब किया. लेकिन वर्षों बाद भी बच्ची का कोई सुराग नहीं मिला, जिसने पुलिस की जांच क्षमता और संवेदनशीलता दोनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
लातेहार में युवक को पुलिस ले गई, फिर नहीं मिला कोई सुराग
लातेहार पुलिस बीते 15 जनवरी 2025 को दिलीप कुमार नामक युवक को अपने साथ ले गई थी. परिवार का आरोप है कि अगले दिन जब वे थाने पहुंचे तो उन्हें भगा दिया गया. पीड़ित परिवार ने एसपी से शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.
इसके बाद मजबूर होकर परिवार ने सीजेएम कोर्ट और फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. मामले में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए लातेहार एसपी को तलब किया और पूछा कि तीन महीने बीत जाने के बाद भी युवक का कोई पता क्यों नहीं चल पाया.
अदालत ने यह संकेत भी दिया कि जरूरत पड़ने पर जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जा सकती है.
चार साल बाद कब्रिस्तान से निकला कंकाल
इसी तरह बोकारो में 16 जून 2022 को लापता हुए खलील अंसारी मामले में भी पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. इसके बाद जब हाईकोर्ट ने फटकार लगाई तो पुलिस ने भारत बस्ती कब्रिस्तान के बगल से जेसीबी से खुदाई कर कंकाल बरामद कियाय
कई जिलों में पुलिस की भूमिका पर सवाल
कई बार रांची, धनबाद, जमशेदपुर, पलामू, गोड्डा, हजारीबाग, गिरिडीह जैसे जिलों में भी गुमशुदगी के मामलों में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं. कई मामलों में परिवारों ने आरोप लगाया कि शुरुआती 48 घंटे में गंभीर कार्रवाई नहीं होने से जांच कमजोर पड़ गई. बाद में जब मामला वरिष्ठ अधिकारियों या हाईकोर्ट तक पहुंचा, तब जाकर पुलिस की टीम सक्रिय हुई.
मुख्यमंत्री ने दिए सख्त निर्देश
दो दिन पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मुख्य सचिव, डीजीपी और सभी जिलों के एसपी के साथ बैठक की. इस दौरान उन्होंने लापता बच्चे-बच्चियों और महिलाओं के मामलों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया.
मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी लंबित मामलों पर विशेष ध्यान देते हुए सुरक्षित रिकवरी सुनिश्चित की जाए. उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य में लोगों को भयमुक्त माहौल देना सरकार की प्राथमिकता है.
मानव तस्करी और कमजोर जांच बना बड़ी चुनौती
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य में मानव तस्करी और संगठित गिरोह सक्रिय हैं. लेकिन गुमशुदा बच्चों के मामलों में समन्वित और तकनीकी जांच का अभाव है. कई जिलों में केस सिर्फ फाइलों में दबकर रह जाते हैं.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर झारखंड पुलिस लापता बच्चे-बच्चियों को खोजने में इतनी कमजोर क्यों साबित हो रही है? और क्या हाईकोर्ट के दबाव के बिना ऐसे मामलों में कार्रवाई संभव नहीं है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर झारखंड पुलिस गुम हुए बच्चों को खोजने में इतनी कमजोर क्यों साबित हो रही है? और क्या बिना हाई कोर्ट के दबाव के ऐसे मामलों में कार्रवाई संभव ही नहीं है?
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