Ranchi : झारखंड की राजनीति में इन दिनों सिर्फ बयान नहीं, चिट्ठियां भी चर्चा में हैं. हर नए पत्र के साथ नए सवाल उठ रहे हैं और हर जवाब के साथ सियासी हलचल थोड़ी और बढ़ जाती है. शुरुआत तब हुई, जब वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू को पत्र लिखकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश के नेतृत्व और संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाए.
मामला पार्टी के भीतर का था, लेकिन चिट्ठी सार्वजनिक हुई तो चर्चा सत्ता के गलियारों तक पहुंच गई.
बीते दिन राधाकृष्ण किशोर ने पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए. उनका कहना था कि उन्हें जितनी सुरक्षा मिली है, उसकी जरूरत नहीं है. इसके बाद उन्होंने अपनी सुरक्षा में तैनात सभी जवानों और सरकारी वाहनों को वापस कर दिया. इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी.
यहीं से एक नया अध्याय शुरू हुआ. स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने कहा कि मंत्री को इस तरह डीजीपी को पत्र नहीं लिखना चाहिए था. उनका मानना था कि ऐसे मुद्दों पर सरकार के भीतर बात होनी चाहिए. जवाब देने में राधाकृष्ण किशोर ने भी देर नहीं की.
उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पत्र नहीं लिखना चाहिए था, तो स्वास्थ्य मंत्री को भी रिम्स के निदेशक को पत्र नहीं लिखना चाहिए था. इसके बाद दोनों मंत्रियों के बीच बयानबाजी खुलकर सामने आ गई.
इसी बीच मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा
इन सब घटनाओं के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का शुक्रवार को दिल्ली रवाना होना भी राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गया. मुख्यमंत्री अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ सेवा विमान से दिल्ली गए. उनके इस दौरे को सार्वजनिक नहीं किया गया और दिल्ली में किसी सरकारी कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं दी गई.
बताया जा रहा है कि वे 5 या 6 जुलाई को रांची लौट सकते हैं. जबकि 8 और 9 जुलाई को दिल्ली में आयोजित स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन कार्यक्रम में उनकी आधिकारिक भागीदारी तय मानी जा रही है. मुख्यमंत्री के दिल्ली जाने के समय को लेकर भी राजनीतिक हलकों में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं.
कोई इसे राधाकृष्ण किशोर के हालिया कदमों से जोड़कर देख रहा है, तो कुछ लोग इसे कांग्रेस संगठन में चल रही हलचल के संदर्भ में समझने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है.
क्या सिर्फ पत्र, या कोई संदेश भी?
इन घटनाओं को अलग-अलग देखकर शायद कोई खास बात न लगे, लेकिन जब इन्हें एक साथ जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर कुछ और दिखाई देती है. एक ओर संगठन को लिखी चिट्ठी, दूसरी ओर प्रशासन को पत्र, फिर स्वास्थ्य मंत्री के साथ सार्वजनिक जवाबी बहस और इसी दौरान मुख्यमंत्री का सार्वजनिक जानकारी के बिना दिल्ली जाना.
सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ अपनी बात रखने का तरीका है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है? लोकतंत्र में सवाल पूछना और अपनी बात रखना गलत नहीं है. लेकिन जब सवाल घर के भीतर से उठें और जवाब भी सार्वजनिक मंच से आएं, तो चर्चा होना तय है.
फिलहाल राधाकृष्ण किशोर की चिट्ठियां सिर्फ कागज के पन्ने नहीं रह गई हैं. वे झारखंड की राजनीति में एक नई बहस का हिस्सा बन चुकी हैं. अब देखना यह होगा कि इन चिट्ठियों का अगला पता कौन होगा, अगला संदेश क्या होगा और मुख्यमंत्री के दिल्ली दौरे के बाद राजनीतिक तस्वीर किस दिशा में आगे बढ़ती है.
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