Ranchi : रेल यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली राजकीय रेल पुलिस (जीआरपी) खुद बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है. झारखंड में जीआरपी थानों की हालत इतनी खराब है कि कई जगह न तो विधिवत हाजत (लॉकअप) है, न मालखाना, और न ही जवानों के रहने के लिए बैरेक की व्यवस्था.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब पुलिस के पास खुद बुनियादी संसाधन नहीं हैं, तो यात्रियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
राज्य में 23 राजकीय रेल थाना, 5 ओपी थाना और 10 पुलिस पोस्ट हैं. लेकिन इनमें से अधिकांश जगहों पर ढांचा बेहद जर्जर या अस्थायी है. कई थाने रेलवे स्टेशन परिसर के एक छोटे से कमरे में चल रहे हैं, तो कहीं खंडहरनुमा भवनों में जवान ड्यूटी करने को मजबूर हैं.
आरोपी को रखने तक की व्यवस्था नहीं
सूत्रों के अनुसार, जब जीआरपी किसी आरोपी को गिरफ्तार करती है, तो उसे रखने के लिए अलग से हाजत उपलब्ध नहीं होती. मजबूरी में आरोपी को उसी कमरे में बैठाकर रखना पड़ता है, जहां पुलिसकर्मी खुद ड्यूटी करते और आराम करते हैं.
कुछ जगहों पर अस्थायी कमरों या जर्जर कमरों का उपयोग किया जाता है, जो सुरक्षा मानकों के लिहाज से बेहद चिंताजनक है. कई बार इस ढीली व्यवस्था का फायदा उठाकर आरोपी फरार भी हो चुके हैं. हालांकि बाद में कड़ी मशक्कत के बाद उन्हें दोबारा पकड़ लिया गया, लेकिन ऐसी घटनाएं सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े करती हैं.
मालखाना नहीं, सबूतों की सुरक्षा पर खतरा
थानों में मालखाना नहीं होने से बरामद सामान को सुरक्षित रखना भी चुनौती बना हुआ है. चोरी, लूट या अन्य मामलों में जब्त किए गए सामान को रखने के लिए उचित व्यवस्था नहीं होने से साक्ष्यों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी रहती है. कई बार सामान को अस्थायी अलमारी या कमरे में रखा जाता है, जिससे कानूनी प्रक्रिया प्रभावित होने का खतरा बना रहता है.
जवानों का हाल भी बेहाल
जवानों के लिए रहने की समुचित व्यवस्था नहीं है. न बैरेक, न शौचालय की पर्याप्त सुविधा. कई जगह जवान एक ही कमरे में रहकर और वहीं से ड्यूटी कर दिन गुजार रहे हैं. इससे न सिर्फ उनका मनोबल प्रभावित हो रहा है, बल्कि कार्यक्षमता पर भी असर पड़ रहा है.
जमीन और फंड के अभाव में अटका निर्माण
जवानों के मुताबिक, नए जीआरपी थाना भवन के निर्माण को लेकर कई बार प्रस्ताव भेजे गए. बताया जाता है कि केंद्र सरकार ने जमीन उपलब्ध कराने की शर्त रखी थी, जबकि राज्य सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी.
वहीं फंड आवंटन की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी. नतीजा यह हुआ कि वर्षों से जीआरपी थानों का निर्माण अधर में लटका हुआ है. जबकि अन्य राज्यों में आधुनिक सुविधाओं से लैस रेल थाने संचालित हो रहे हैं.
बड़ा सवाल : जिम्मेदार कौन?
रेलवे स्टेशनों पर बढ़ती भीड़, अपराध की घटनाएं और यात्रियों की सुरक्षा के बीच जीआरपी की यह बदहाल स्थिति चिंता का विषय है. जब पुलिसकर्मी ही असुविधाओं में काम करने को मजबूर हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है.
अब जरूरत है कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर इस दिशा में ठोस पहल करें, ताकि जीआरपी थानों को बुनियादी सुविधाएं मिलें और रेल यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो सके.
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