इस बीच झामुमो और भाजपा में तू-तू, मैं-मैं तेज हो गई है. भाजपा ने जहां झामुमो को दोगली राजनीति करने वाली पार्टी बताया है, वहीं झामुमो ने भाजपा को टिकट बेचने वाला बताया है.
आठ जून को झामुमो ने एक ट्वीट करके लिखा कि भाजपा के विधायकों को भी बाबूलाल जी ने सिर्फ दरी बिछाने, कुर्सी लगाने और भीड़ जुटाने के लिए रख छोड़ा है. इनकी हालत दयनीय है. न जनता की आवाज उठाने की आजादी, न क्षेत्र के मुद्दों पर बोलने की स्वतंत्रता. एक नेता बोलता है, बाकी सब सुनता है. एक फैसला लेता है, बाकी सिर्फ पालन करता है.
इस पर झारखंड भाजपा ने एक्स पर एक ट्वीट करके लिखा कि झामुमो की दोगली राजनीति खत्म होने वाली है. राज्यसभा सीट को लेकर झामुमो-कांग्रेस में खींचतान क्यों हुई? कांग्रेस के पर्यवेक्षकों को बार-बार रांची आकर हेमंत सोरेन से मान-मनौव्वल क्यों करना पड़ा. कभी दोनों सीटों पर लड़ने की हात, कभी कांग्रेस का अलग दावा औऱ फिर पर्दे के पीछे सौदेबाजी का खेल क्यों खेला गया.
इसके जवाब में झामुमो ने कहा कि परिमल नाथवानी बड़े प्रसन्नता के साथ ये ट्वीट पढ़ रहे होंगे. इतनी बड़ी-बड़ी बातें और टिकट बेच दिया. कम से कम शून्य वाले ( भाजना नेता गौरव बल्लभ) को तो दे देते.
कुल मिलाकर झामुमो और भाजपा एक-दूसरे की पार्टी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. इन सबके बीच सच तो यही है कि भाजपा के पास अपने दम पर प्रत्याशी को जिताने का आंकड़ा नहीं है. परिमल नाथवानी को भाजपा का समर्थन मिल गया है. इसके बाद भी चार वोट कम हो रहे हैं. तो खरीद-फरोख्त, लालच और डर की राजनीति होनी तय है.
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